पूर्वोत्तर के लिए बौद्ध परिपथ योजना: सांस्कृतिक कूटनीति के नए अध्याय की ओर भारत-प्रो. अरविंद कुमार सिंह(प्रोफेसर, बौद्ध अध्ययन)

ग्रेटर नोएडा:देश के आंतरिक विकास और विदेश नीति को एक साझा सूत्र में पिरोने वाली एक महत्वपूर्ण पहल के अंतर्गत भारत की वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने संसद में प्रस्तुत केंद्रीय बजट 2026 में पूर्वोत्तर भारत के लिए एक समर्पित बौद्ध परिपथ योजना (Buddhist Circuit Scheme) की घोषणा की। अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, असम, मणिपुर, मिज़ोरम और त्रिपुरा को समाहित करने वाली इस योजना का उद्देश्य केवल बौद्ध विरासत का विकास और संरक्षण भर नहीं है, बल्कि दक्षिण एशिया (SAARC) और दक्षिण-पूर्व एशिया (ASEAN) के देशों के साथ भारत के प्राचीन सभ्यतागत संबंधों को रणनीतिक रूप से सुदृढ़ करना भी है। विदेश नीति के दृष्टिकोण से यह पहल भारत की सांस्कृतिक कूटनीति के विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखी जा सकती है।
रणनीतिक गहराई वाली सांस्कृतिक पहल
प्रस्तावित बौद्ध परिपथ योजना के अंतर्गत बौद्ध मठों और पवित्र स्थलों के संरक्षण, तीर्थयात्रा व्याख्या केंद्रों (Pilgrimage Interpretation Centres) की स्थापना तथा पर्यटन अवसंरचना और सुविधाओं के उन्नयन पर विशेष ध्यान दिया गया है। प्रथम दृष्टया यह एक विरासत और पर्यटन विकास परियोजना प्रतीत हो सकती है, किंतु गहराई से देखने पर इसके भीतर सांस्कृतिक कूटनीति की स्पष्ट झलक मिलती है। बौद्ध धर्म एशिया के अधिकांश भागों में एक साझा सभ्यतागत विरासत का प्रतिनिधित्व करता है—विशेष रूप से नेपाल, श्रीलंका, भूटान, म्यांमार, थाईलैंड, लाओस, कंबोडिया और वियतनाम जैसे देशों में।
ऐसे में पूर्वोत्तर भारत, जो ऐतिहासिक रूप से भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच प्रवेश द्वार रहा है, वहाँ स्थित बौद्ध स्थलों के विकास के माध्यम से भारत स्वयं को इस साझा विरासत के संरक्षक के रूप में पुनः स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। वित्त मंत्री की यह घोषणा इस व्यापक समझ के अनुरूप है कि संस्कृति और आध्यात्म कूटनीति के प्रभावी उपकरण हो सकते हैं। बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों के बीच साझा सभ्यतागत मूल्यों पर आधारित भारत का यह दृष्टिकोण एक समावेशी और गैर-संघर्षात्मक मार्ग प्रस्तुत करता है।
सभ्यतागत गलियारे के रूप में पूर्वोत्तर भारत
भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया को जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और सभ्यतागत अक्ष रहा है। हिमालयी दर्रे, ब्रह्मपुत्र घाटी की नदी प्रणालियाँ और प्राचीन व्यापार मार्ग केवल वस्तुओं और जनसंख्या के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं थे, बल्कि उन्होंने धार्मिक, कलात्मक और मठवासी परंपराओं के प्रसार में भी अहम भूमिका निभाई। अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, असम और मणिपुर के कुछ हिस्सों की बौद्ध विरासत तिब्बत, भूटान और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ लंबे समय तक चले धार्मिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की साक्षी है।
अरुणाचल प्रदेश में बौद्ध धर्म का विकास मुख्यतः महायान और वज्रयान परंपराओं के माध्यम से हुआ, जिनका गहरा संबंध तिब्बत और भूटान से रहा है। तवांग मठ—जो एशिया के सबसे बड़े बौद्ध मठों में से एक है—न केवल धार्मिक अध्ययन और साधना का केंद्र है, बल्कि भारत और ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र के बीच ऐतिहासिक बौद्ध संपर्कों का प्रतीक भी है। मोनपा और शेरदुकपेन जनजातियों की धार्मिक परंपराओं में बौद्ध सिद्धांतों और स्थानीय संस्कृति का अनूठा समन्वय दिखाई देता है।
सिक्किम पूर्वोत्तर की बौद्ध विरासत में एक विशिष्ट स्थान रखता है। सत्रहवीं शताब्दी से ही यह क्षेत्र न्यिंगमा और काग्यू परंपराओं का प्रमुख केंद्र रहा है। रूमटेक, पेमायंगत्से, ताशिडिंग और फोदोंग जैसे मठ आज भी धर्म, कला और शिक्षा के जीवंत केंद्र हैं। सिक्किम की बौद्ध परंपरा के केंद्र में गुरु पद्मसम्भव (गुरु रिनपोछे) की विरासत है, जिन्हें वज्रयान बौद्ध धर्म का प्रवर्तक और ‘द्वितीय बुद्ध’ माना जाता है। उनसे जुड़े ध्यान-गुफाएँ, ‘बेयुल’ (गुप्त पवित्र भूमि) और तीर्थ-स्थल सिक्किम को भूटान, अरुणाचल और तिब्बत से जोड़ते हैं, जिससे एक साझा पवित्र भूगोल निर्मित होता है जो आधुनिक राजनीतिक सीमाओं से परे है।
असम भी बौद्ध धर्म के ऐतिहासिक प्रसार में एक महत्वपूर्ण, यद्यपि अपेक्षाकृत कम चर्चित, केंद्र रहा है। प्राचीन कामरूप क्षेत्र में प्राप्त मूर्तियाँ, टेराकोटा कला और स्तूप-विहारों के अवशेष ईसा की प्रारंभिक शताब्दियों से लेकर मध्यकाल तक बौद्ध उपस्थिति की पुष्टि करते हैं। चीनी यात्री ह्वेनसांग के विवरण असम में बौद्ध अध्ययन और साधना की परंपरा को प्रमाणित करते हैं। ब्रह्मपुत्र घाटी ने भिक्षुओं, व्यापारियों और विद्वानों के आवागमन को सुगम बनाकर बौद्ध विचारों के म्यांमार और आगे दक्षिण-पूर्व एशिया तक प्रसार में भूमिका निभाई।
मणिपुर और त्रिपुरा में भी बौद्ध संबंध ऐतिहासिक अवशेषों और सांस्कृतिक संपर्कों के माध्यम से दृष्टिगोचर होते हैं। मणिपुर का म्यांमार से दीर्घकालिक संपर्क थेरवाद और महायान प्रभावों के रूप में दिखाई देता है, जबकि त्रिपुरा में बौद्ध प्रतिमाओं और स्थलों के अवशेष इसे बंगाल-असम-अराकान क्षेत्र से जोड़ते हैं। इनमें से अनेक स्थल अभी भी शोध और संरक्षण की प्रतीक्षा में हैं।
‘एक्ट ईस्ट नीति’ और ‘राइजिंग नॉर्थईस्ट’
बौद्ध परिपथ योजना भारत की एक्ट ईस्ट नीति और राइजिंग नॉर्थईस्ट की व्यापक रूपरेखा के अनुरूप है, जिनमें संपर्क, व्यापार, पर्यटन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को क्षेत्रीय विकास का आधार माना गया है। यह योजना सड़कों, रेल, हवाई और डिजिटल कनेक्टिविटी में हो रहे निवेशों के साथ मिलकर विरासत-आधारित पर्यटन को सुदृढ़ करेगी। कूटनीतिक दृष्टि से यह नीति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत और सांस्कृतिक कूटनीति को भी केंद्र में रखती है।
SAARC और ASEAN के साथ संबंधों को सुदृढ़ करना
भारत-नेपाल बौद्ध परिपथ जैसी पहलों ने पहले ही SAARC देशों, विशेषकर नेपाल, श्रीलंका और भूटान के साथ साझा विरासत को रेखांकित किया है। नई योजना इस अवधारणा को पूर्व की ओर विस्तारित करती है। पूर्वोत्तर में विकसित बौद्ध अवसंरचना के माध्यम से ऐसे तीर्थ मार्ग संभव होंगे, जो नेपाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और हिमालयी क्षेत्र को अरुणाचल और सिक्किम से जोड़ेंगे। इससे पर्यटन, विरासत प्रबंधन और अकादमिक सहयोग को बढ़ावा मिलेगा।
ASEAN देशों के संदर्भ में यह पहल और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। थाईलैंड, म्यांमार, लाओस, कंबोडिया और वियतनाम जैसे देशों में बौद्ध विरासत गहराई से निहित है। ऐसे में भारत की यह सांस्कृतिक कूटनीति वहाँ व्यापक प्रतिध्वनि उत्पन्न करती है और भारत को न केवल तीर्थ गंतव्य, बल्कि साझेदार के रूप में प्रस्तुत करती है।
बुद्ध अवशेष प्रदर्शनी और जन-जन का संपर्क
भारत की बौद्ध कूटनीति को मजबूती देने में बुद्ध के पवित्र अवशेषों की अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिसे संस्कृति मंत्रालय और अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ (IBC) के सहयोग से आयोजित किया गया। श्रीलंका, थाईलैंड, मंगोलिया और वियतनाम जैसे देशों में इन प्रदर्शनों ने करोड़ों श्रद्धालुओं को आकर्षित कर गहन जन-जन संपर्क को प्रोत्साहित किया। पूर्वोत्तर भारत में IBC द्वारा आयोजित सम्मेलन और सांस्कृतिक गतिविधियाँ स्थानीय परंपराओं को एशियाई बौद्ध नेटवर्क से जोड़ने में सहायक रही हैं।
निष्कर्ष:केंद्रीय बजट 2026 में पूर्वोत्तर बौद्ध परिपथ की घोषणा और भारत की सतत बौद्ध सांस्कृतिक कूटनीति यह संकेत देती है कि भारत एक दीर्घकालिक सभ्यतागत रणनीति पर कार्य कर रहा है। यह पहल पूर्वोत्तर को दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच एक जीवंत सभ्यतागत सेतु के रूप में पुनर्स्थापित करती है। मठों, तीर्थ-स्थलों और व्याख्या केंद्रों का विकास न केवल क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था और संपर्क को बढ़ावा देगा, बल्कि शांति, सहयोग और साझा मूल्यों पर आधारित भारत की एशियाई दृष्टि को भी सुदृढ़ करेगा। बुनियादी ढाँचे, आध्यात्म और कूटनीति का यह संगम भारत की एक्ट ईस्ट नीति के भीतर पूर्वोत्तर को मजबूती से स्थापित करता है और एशिया में समझ और सहयोग के नए रास्ते खोलता है।







