दनकौर

बंदरों के आतंक से लोग परेशान, नहीं हो रहा समाधान

तीन से चार केस रोज आते हैं – डाॅ. डाक्टर नारायण किशोर प्रभारी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र डाढ़ा

बिलासपुर :बंदरों के आतंक निरंतर बढ़ने से लोग परेशान हैं। जिला प्रशासन से बार-बार लोग बंदरों से छुटकारा दिलाने की मांग करते रहे हैं, लेकिन समाधान नहीं हो रहा है। निरंतर बांजरपुर गांव में बढ़ रही बंदरों की संख्या के कारण लोग घरों में कैद होने को मजबूर हो गए है।

बंदरों से बचने के लिए लोग हजारों रुपए खर्च करके लोहे के जाल लगवा रहे हैं। बंदर हर रोज किसी किसी गांव में बच्चों, बुजुर्गों, राहगीरों महिलाओं को काट रहे हैं। गांवों के लोगों ने कहा कि जिला प्रशासन व प्राधिकरण प्रशासन को चाहिए कि वह बंदरों को पकड़वा कर इनके आतंक से छुटकारा दिलाएं,

गलियों में निकलना हुआ मुश्किल : बांजरपुर, पंचायतन, हतेवा कोठी, बिलासपुर में बंदरों की बढ़ रही संख्या के चलते गलियों में लोगों का निकला मुश्किल हो गया है। बंदरों की टोलियां घरों में घुस कर घर में रखा सामान उठा कर ले जाती हैं। बंदरों के डर से गलियों में, छतों पर बच्चे नहीं खेलते हैं। महिलाएं भी छतों पर कपड़े सुखाने के बाद उनकी रखवाली करती हैं। बंदर छतों पर सूखने वाले कपड़े ले जाते हैं। घरों के आगे बंदरों के आतंक से बचने के लिए जाल हजारों रुपए खर्च करके लोग लगवा रहे हैं।

दिलवाएंगे छुटकारा :इस बारे में जिलाधिकारी, ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण व नगर पंचायत कार्यालय में दिए गए शिकायती पत्र पर संबंधित अधिकारियों का कहना है कि गांवों व कस्बे के लोगों को बंदरों के आतंक से जल्द से जल्द छुटकारा दिलाया जाएगा।

बंदरों के आतंक का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दनकौर व डाढा अस्पताल में हर रोज तीन से चार केस आते हैं जिन्हें बंदरों ने काटा हुआ है। बंदर के काटने के बाद रेबीज का इंजेक्शन लगाया जाता है। निरंतर मरीजों की संख्या बढ़ रही है। डॉ. नारायण किशोर प्रभारी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र डाढ़ा ने कहा कि जो केस अस्पताल में आ रहे हैं उनमें से अधिकांश बंदरों के काटे हैं। कुछ केस कुत्ते के काटे के भी रहे हैं। मरीजों के लिए अस्पताल में रेबीज के इंजेक्शन उपलब्ध हैं।

अकेले नहीं जा सकते : वंदना 

बंदरों का आतंक इतना है कि गली से राहगीर अकेले नहीं जा सकता है। गलियों की दीवार पर बंदर टोलियों के साथ बैठे रहते हैं। बंदर हर रोज किसी किसी मोहल्ले में बच्चों, राहगीरों, महिलाओं को काट रहे हैं। कई बार प्रशासन से बंदरों से छुटकारा दिलाने की मांग कर चुके हैं लेकिन समाधान नहीं हो रहा है।

लोहे के जाल लगवाने पड़े : विनय शास्त्री 

बंदरों का इतना आतंक है कि घरों पर लोहे के जाल लगवाने पड़ रहे हैं। बच्चे छत्त, गली में अकेले खेल नहीं सकते हैं। अभिभावकों को डर रहता है कि बच्चों को बंदर काट लें। बंदरों की संख्या निरंतर बढ़ रही है।’

इंसानों व बंदरों के संघर्ष कम के लिए जागरुकता जरूरी : सोनू चौहान 

बंदरों का आतंक एक जटिल समस्या है जिनका समाधान एक साथ मिलकर करना होगा। लोगों को जागरूक होना होगा और सरकार को भी प्रभावी उपाय करने होंगे ताकि बंदरों और इंसानों के बीच संघर्ष को कम किया जा सके

बंदरों का आतंक एक गंभीर समस्या है जिसका उपाय किया जा सकता है।

बंदरों के आतंक के कुछ सामान्य कारण

पर्यावास का नुकसान:नगरों और गांवों का विस्तार होने से बंदरों के प्राकृतिक आवास कम हो रहे हैं, जिससे वे भोजन और आश्रय की तलाश में इंसानों के करीब आ रहे हैं।

भोजन की उपलब्धता:खुले में फेंका गया कूड़ा, खुले में रखा भोजन और बगीचों में उगने वाले फल बंदरों को आकर्षित करते हैं।

मानवीय व्यवहार:कुछ लोग बंदरों को खाना खिलाते हैं, जिससे वे इंसानों से डरना छोड़ देते हैं और उनसे भोजन मांगने लगते हैं।

बंदरों के आतंक से निपटने के लिए कुछ उपाय

कूड़ा-कचरा ढककर रखें:कूड़ा-कचरा ढककर रखने से बंदरों को भोजन नहीं मिलेगा और वे आकर्षित नहीं होंगे।

फल और सब्जियां ढककर रखें:बगीचों में उगने वाले फल और सब्जियों को ढककर रखें ताकि बंदर उन तक न पहुंच सकें।

बंदरों को न खिलाएं:बंदरों को खाना खिलाने से बचें, इससे वे इंसानों से डरना छोड़ देंगे।

वन विभाग से संपर्क करें:यदि बंदरों का आतंक बहुत ज्यादा है, तो वन विभाग से संपर्क करें ताकि वे बंदरों को पकड़कर सुरक्षित स्थान पर ले जा सकें।

सुरक्षा उपाय:घरों और दुकानों को सुरक्षित बनाने के लिए जाली, ग्रिल आदि का उपयोग करें।

रिपोर्ट-घनश्याम पाल

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