किसान फसलें नहीं उगाता, किसान ऐसा वातावरण बनाता है जिसमें फसलें उग सकें – डॉ शैलेश रौसा
आयुर्वेद चिकित्सक का आमजन को प्राकृतिक फसल उपजाने के लिए जागरुक करने का प्रयास

पांच दिन आयुर्वेद चिकित्सक व दो दिन जैविक खेती से स्वास्थ्य सुधारने का प्रयास ला रहा है रंग
बिलासपुर:डॉ. शैलेश रौसा आयुर्वेदिक चिकित्सक हैं जो मरीजों की पंचगव्य इलैक्ट्रो प्राकृतिक आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति से इलाज करने के साथ-साथ उनके संपूर्ण स्वास्थ्य का भी आकलन करते हैं। उनकी यही अनूठी रुचि उन्हें सेवा परियोजनाओं के क्षेत्र में ले आई है, जहां वे लोगों को उनकी स्वास्थ्य से परे मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। वे अपने मरीजों के खान-पान का भी ध्यान रखते हैं। मैंने उनकी सेवा परियोजना के इस दृष्टिकोण को “खेत से थाली तक” नाम दिया है।
आम तौर पर बुधवार व वृहस्पतिवार को, डॉक्टर शैलेश रौसा मरीजों की सेवा से अलग आवास व गौशाला की छतों पर जैविक खेती करने का आनंद लेते हैं।
डाक्टर शैलेश रौसा का मानना है कि रासायनिक फसलें व अनियमित दिनचर्या ही अस्वस्थता का मूल कारण है। आज जरूरत इस बात की है कि प्राकृतिक फसलों में विश्वास को फिर से मजबूत किया जाए। एक कहावत है, “दूसरों के लिए एक उदाहरण बनें।” कई पीढ़ियों से किसान रासायनिक खेती करते आ रहे हैं। इसलिए, उन्हें प्राकृतिक खेती की ओर वापस लाने के लिए केवल प्रेरक शब्दों से काम नहीं चलेगा। डाक्टर शैलेश रौसा ने खुद एक उदाहरण बनने का फैसला किया।
डाक्टर शैलेश रौसा परिवार के पूर्ण सहयोग से प्राकृतिक खेती शुरू की। डॉ. शैलेश रौसा गर्व से बताते हैं, सरकपुर गांव स्थित आवास व गौशाला की छत पर प्राकृतिक खेती की। दृढ़ विश्वास के साथ वे कहते हैं, मुझे पता था कि जब किसान हमें कीटनाशकों आदि के उपयोग के बिना सफलतापूर्वक खेती करते और पैसे बचाते हुए देखेंगे, तो वे आसानी से रासायनिक खेती छोड़कर प्राकृतिक खेती की ओर रुख कर लेंगे।
डाक्टर शैलेश रौसा मुस्कुराते हुए याद करते हैं, “वो दिन नई-नई चीजें सीखने और खेती की शुरुआती मुश्किलों से निपटने के दिन थे। हम पूरे हफ्ते प्राकृतिक खेती के बारे में सीखने के लिए होमवर्क करते थे। फिर बुधवार व वृहस्पतिवार को खेत में उस सीख को अमल में लाते थे। इसलिए घर पर हम खुद को ‘बुधवार व वृहस्पतिवार के किसान’ कहते हैं।
प्राकृतिक खेती के ज्ञान और अनुभव से परिपूर्ण डाक्टर शैलेश रौसा बताते हैं, हमने अपनी ज़मीन पर कभी रसायनों का इस्तेमाल नहीं किया। पहला साल सीखने का साल था। प्राकृतिक खेती में मुख्य रूप से देसी गोबर, गाय का मूत्र और देसी गाय के दूध से बनी छाछ का इस्तेमाल होता है। जब कीड़े हमारी फसलों को नष्ट करने लगे, तभी हमने नीमस्त्र (नीम के पत्ते, गोबर, गाय के मूत्र और पानी का मिश्रण) का छिड़काव किया। इन सबने हमारी ज़मीन को उपजाऊ बना दिया है। हम समय-समय पर सभी प्रकार की फसलें उगाते हैं।
” गौशाला की छत के ऊपर गोवर डालकर पालक, मैथी, बथुआ, सरसों, मूली, गाजर, शलगम, बाकला, टमाटर, फूल गोभी, पत्ता गोभी, ब्रोकली, धनियां, शिमला मिर्च, चुकंदर, बैंगन करेला, हरि मिर्च, प्याज, लहसुन आदि सब्जियां बिना कीटनाशक रसायन यूरिया डीएपी के इतनी उत्तम पैदावार एक पेड़ पर 273 टमाटर 100% प्राकृतिक जिनको खाकर शरीर स्वस्थ रखना चाहते हैं भोजन, पानी, हवा शुद्ध कीजिए भोजन में 80% फल सब्जियां सलाद 20% अनाज घर की छत पर इस तरह से सब्जियां सलाद और फल उगाकर अपना स्वास्थ्य और पैसा दोनों बचा सकते हैं । निःशुल्क प्रशिक्षण हमारे पास आकर ले सकते हैं,
रिपोर्ट- घनश्याम पाल निर्मल






