दाऊजी ने प्रज्वलित किया संस्कृति का दीप, सौ वर्ष बाद भी प्रज्वलित है पिहोवा की रामलीला
खाम्बी की ब्रजभूमि से पिहोवा तक पहुंची श्रीराम की भक्ति-परंपरा; पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित है लोकसंस्कृति की यह अमूल्य विरासत

पिहोवा: कुछ परंपराएं केवल समय के साथ नहीं चलतीं, बल्कि समय को अपनी संस्कृति, आस्था और संस्कारों से पहचान देती हैं। धर्मनगरी पिहोवा की श्री सरस्वती राम नाटक क्लब की रामलीला ऐसी ही गौरवशाली परंपरा है, जो वर्ष 1927 में आरंभ होकर आज अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। सौ वर्षों की यह यात्रा केवल रामलीला मंचन की यात्रा नहीं, बल्कि भक्ति, लोकसंस्कृति, अनुशासन, समर्पण और भारतीय जीवन-मूल्यों की अखंड साधना का इतिहास है।
इस महान परंपरा के मूल में जिस व्यक्तित्व की तपस्या और सांस्कृतिक चेतना दिखाई देती है, वे हैं पंडित बलदेव दाऊजी। उनकी जन्मभूमि ग्राम खाम्बी, जिसे ब्रज परंपरा में ‘खम्बवन’ से संबद्ध माना जाता है, रही। ब्रजभूमि की सांस्कृतिक चेतना और श्रीराम-श्रीकृष्ण की भक्ति से अनुप्राणित दाऊजी ने लोकमंच को केवल मनोरंजन का साधन नहीं माना, बल्कि उसे भक्ति, लोकशिक्षा और भारतीय संस्कृति के संरक्षण का सशक्त माध्यम बनाया।

पंडित बलदेव दाऊजी ने विभिन्न स्थानों पर जाकर श्रीराम और श्रीकृष्ण की कथाओं तथा उनकी बाल लीलाओं का अत्यंत मार्मिक एवं सजीव लोकमंचन किया। उनकी वाणी, अभिनय और भावाभिव्यक्ति में भक्ति की ऐसी प्रगाढ़ता थी कि दर्शक कथा के साथ आत्मिक रूप से जुड़ जाते थे। श्रीराम वनगमन, सीताहरण और जटायु महाराज के अंतिम समय में प्रभु श्रीराम से मिलन जैसे प्रसंगों के मंचन के समय वातावरण करुणा और भक्ति से आप्लावित हो उठता था तथा दर्शकों की आंखों से अश्रुधारा बहने लगती थी।
दाऊजी के लिए अभिनय केवल कला नहीं, बल्कि ईश्वर-स्मरण और समाज-संस्कार की साधना था। वे अपने शिष्यों को केवल मंचन की कला नहीं सिखाते थे, बल्कि जीवन में परिश्रम, अनुशासन, सदाचार और सेवा का महत्व भी समझाते थे। निर्धनों और असहायों के प्रति उनके हृदय में विशेष करुणा थी।
उनके सुपुत्र पंडित गोपालदत्त शर्मा बताते हैं कि दाऊजी की वाणी में मानो स्वयं मां सरस्वती का वास था। वे स्वयं भी रामलीला में भगवान श्रीराम की भूमिका निभाते थे। पिता की स्मृतियों को याद करते हुए वे आज भी भावुक हो उठते हैं। उनके अनुसार दाऊजी अपने शिष्यों को बच्चों की तरह स्नेह करते थे और उन्हें जीवन की कठिनाइयों का सामना करने के लिए सदैव प्रेरित करते थे।
दाऊजी के प्रमुख शिष्यों में पंडित गंगाप्रसाद शर्मा, पंडित दुलीचंद जी, पंडित परसी अर्थात् परशुराम जी, पंडित तोतीराम मास्टर जी, पंडित बालिकराम जी तथा पंडित गिरिराज मास्टर जी सहित अनेक नाम उल्लेखनीय रहे।
वर्ष 1927 में पंडित बलदेव दाऊजी ने पंडित कृष्ण जोशी को निर्देशक बनाकर पिहोवा में श्री सरस्वती राम नाटक क्लब की रामलीला का शुभारंभ कराया। उस समय रोपा गया सांस्कृतिक बीज आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है।
विपरीत परिस्थितियों में भी नहीं बुझी आस्था की लौ
इस शताब्दी की यात्रा में अनेक कठिन दौर आए। वर्ष 1947 के विभाजन और दंगों की त्रासदी, वर्ष 1984 का कठिन समय, आर्थिक चुनौतियां तथा कोरोना महामारी जैसी परिस्थितियों ने जनजीवन को प्रभावित किया, लेकिन रामलीला की परंपरा निरंतर चलती रही। समय बदला, परिस्थितियां बदलीं, कलाकारों की संख्या घटी, किंतु श्रीराम की कथा के प्रति श्रद्धा कभी कम नहीं हुई।
इस रामलीला की सबसे विशिष्ट विशेषता इसकी पारिवारिक परंपरा है। यहां कलाकारों के साथ-साथ पीढ़ियां मंच पर उतरती हैं। पंडित नीलकंठ पौलस्त्य और पंडित कालीचरण अत्री जैसे कलाकारों को आज भी श्रद्धा से याद किया जाता है। नीलकंठ पौलस्त्य की तीसरी पीढ़ी के मयंक पौलस्त्य लंबे समय तक लक्ष्मण की भूमिका निभाते रहे, जबकि उनके परिवार की अगली पीढ़ी के सुभाष पौलस्त्य आज निर्देशन का दायित्व संभाल रहे हैं।
इसी प्रकार करुण अत्री, अभिषेक जोशी, गोल्डी शांडिल्य, बिजेंद्र धीमान और अभिनव सहित अनेक कलाकार अपने पूर्वजों की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। यह केवल कलाकारों की सूची नहीं, बल्कि एक शताब्दी की सांस्कृतिक वंशावली है।
सादगी, भक्ति और काव्यात्मक संवाद इसकी पहचान
आधुनिक मनोरंजन के दौर में भी श्री सरस्वती राम नाटक क्लब की रामलीला ने अपनी मौलिकता सुरक्षित रखी है। यहां अनावश्यक नृत्य और गीतों के स्थान पर भजनों, काव्यात्मक संवादों और भावप्रधान अभिनय के माध्यम से कथा प्रस्तुत की जाती है। यही इसकी सांस्कृतिक गरिमा और विशिष्ट पहचान है।
सौ वर्षों की इस यात्रा में लगभग 90 कलाकार और 10 पदाधिकारी अब इस संसार में नहीं हैं। किंतु उनका समर्पण और स्मृतियां आज भी इस मंच की परंपरा में जीवित हैं। उनके लिए यह रामलीला एक मौन श्रद्धांजलि भी है।
इस गौरवशाली सांस्कृतिक यात्रा का एक भावपूर्ण संबंध ग्राम खाम्बी से भी जुड़ता है। यही वह पावन भूमि है, जिसे ब्रज की सांस्कृतिक परंपरा में ‘खम्बवन’ से संबद्ध माना जाता है और जो पंडित बलदेव दाऊजी की जन्मभूमि रही। संयोग ही नहीं, यह सांस्कृतिक आत्मीयता भी है कि इसी ग्राम खाम्बी की धरती पर जन्मे पंडित भगवत प्रसाद शर्मा आज भी भारतीय संस्कृति, साहित्य, शिक्षा, पत्रकारिता और जनजागरण के क्षेत्र में अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। इस दृष्टि से खाम्बी केवल एक ग्राम नहीं, बल्कि ऐसी सांस्कृतिक चेतना की भूमि है, जिसकी परंपरा पीढ़ियों को अपनी जड़ों, संस्कारों और भारतीय जीवन-मूल्यों से जोड़ती रही है।
11 अक्टूबर से पिहोवा की धरती पर एक बार फिर रामलीला का मंच सजेगा। पात्र सजेंगे, संवाद गूंजेंगे और श्रीराम की मर्यादा का संदेश जन-जन तक पहुंचेगा।
शताब्दी वर्ष का यह मंचन केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि पंडित बलदेव दाऊजी की साधना, उनके शिष्यों के समर्पण, असंख्य कलाकारों की तपस्या और पीढ़ियों की अटूट आस्था का स्मरण होगा।
दाऊजी ने एक शताब्दी पूर्व जो सांस्कृतिक दीप प्रज्वलित किया था, वह आज भी आलोकित है। समय की आंधियां आईं, परिस्थितियां बदलीं और पीढ़ियां गुजर गईं, लेकिन उस दीप की लौ बुझी नहीं।
सौ वर्ष बीत गए, पर श्रीराम की कथा आज भी गूंज रही है।
दाऊजी की साधना आज भी जीवित है।
और पिहोवा की धरती पर श्रीराम की मर्यादा की यह अखंड ज्योति आज भी प्रज्वलित है।
रिपोर्टर-पंडित भगवत प्रसाद शर्मा






