दनकौर

होली विशेष: समय के साथ मिटते जा रहे हैं पुराने रीति-रिवाज

स्कूल संचालक, पर्यावरण व पशु संरक्षक और सेवानिवृत्त ने इंटरनेट से प्रभावित बताया रीति-रिवाज

होली पर बिलासपुर से घनश्याम पाल, 

भारतीय संस्कृति में विभिन्न तीज-त्योहारों और रीति-रिवाजों का बहुत महत्व है । भारतीय परंपराएं सभ्यता संस्कृति को समेटे हुए हैं होली का पर्व जैसा की ज्ञात है उल्लेख नहीं है हमारे राष्ट्रीय पर्व जहां पारंपरिक विधाएं सभ्यता और संस्कृति को समेटे हुए हैं वहीं हमारा हर त्यौहार अपने आप में कुछ ना कुछ विशेषता और महत्व अवश्य रखते है ऐसा ही रंगोत्सव होली का त्योहार प्रेम और भाईचारे को मजबूत बनाता है तो दूसरी ओर होलिका दहन में बुराई को जलाकर अच्छाई ग्रहण करने को प्रेरित करता है । होली का त्योहार की तैयारी जोरों पर है होलिका दहन करना उसकी अग्नि से जौ भूनना, भांग की ठंडाई पी, अबीर गुलाल लगा तथा सारे गिले-शिकवे भुलाकर राम-राम कहे के एक दूजे को गले लगा रंग बिरंगे रंगों से सराबोर आपस में गले मिल ढोल नगाड़े बम्ब और मृदंग की सुर, लय और ताल पर थिरक कर प्रेम व भाईचारे का संदेश देकर भारतीय त्योहारों की सार्थकता को सिध्द किया जाता रहा है घरों में होली पर बनाकर लाए जाने वाले गुंजिया नमकीन पानी के बतासे इत्यादि व्यंजन तो एक दूजे के दिली संबंधों को और मजबूत बनाने का काम करते हैं

इस बार होली पर्व को मनाने के लिए पूर्व की भांति वह जोर से जोर शोर के साथ तैयारियां, ग्रामीण क्षेत्रों में होली का आगाज कराने के लिए बमब नगाड़े और मृदंग पर लोगों के नाचने व थिरकने होली के रसिया और मल्हार हैं कानों में गूंजने वाली गांव में सुबह शाम बम्ब पर डंक की चोट से बजाकर लोग होली के त्यौहार मनाए जाने का एहसास विलुप्त डंके की चोट से बंब के सुरो से आज बिरज में होली रे रसिया जैसे गाकर होली है का एहसास कराने वाली युवाओं की टोली नामोनिशान तक नजर नहीं आ रही है । इंटरनेट, टीवी, मोबाइल आदि के चलते आज युवा पीढी भारतीय संस्कृति को भूलती जा रही है । भारतीय संस्कृति को बचाने के लिए सचेत नहीं हुए तो आने वाले समय के साथ पुराने रीति-रिवाज मिटते जा रहे हैं ।

इंटरनेट, टीवी, मोबाइल आदि के चलते आज युवा पीढी भारतीय संस्कृति को भूलती जा रही है । त्योहार पर युवा कुश्ती, कबड्डी, दौड़ आदि खेल खेलते हैं जबकि महिलाएं बच्चों के लिए पकवान बनाती हैं। लेकिन सभी कृतिम बाजारों पर निर्भर भागदौड़ भरी जिंदगी में ये पुराने रीति रिवाज गुम होते जा रहे है ।

संजय नवादा, अध्यक्ष पर्यावरण संरक्षण समिति बताते हैं “भारतीय संस्कृति आपसी भाईचारे का संगम होता था । महिलाएं ऐसे त्योहार पर एक जगह एकत्रित होकर एक टोली में रसिया गाकर लोककथाएं कह रंगों से सराबोर नाच गाने करती थी अब त्योहार पर यह एकता दूर दूर तक नजर नहीं आती ।

रजावती पाल, सेवानिवृत्त हेल्थ विजीटर्स कहती हैं कि “ठंडाई पी अबीर गुलाल लगा सारे गिलेशिकवे भूलकर राम राम कह के एक दूजे को गले लगाकर रंगबिरंगे रंगों से सराबोर ढोल नगाड़ों बम्ब मृदंग की सुर लय ताल पर थिरक खर भाईचारे का संदेश देने वाले गांवों से युवाओं की टोली की एकता इंटरनेट पर सिमट गई है । युवा पुराने रीति रिवाज को भूल गए ।

प्रदीप शर्मा, प्रबंधक एसडी कन्या इंटर कालेज बिलासपुर कहते हैं कि वर्तमान समय में इंटरनेट फेसबुक आदि के बढ़ते प्रचलन के चलते अधिकतर लोग विशेष कर युवा पारंपरिक त्योहार को भूलते जा रहे है । लोग भारतीय संस्कृति से विमुख होते जा रहे हैं ।

वसुधा वधावन, पशु संरक्षक

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