गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय एवं आईकेएस हेरिटेज एसोसिएशन (इक्शा) के संयुक्त तत्वावधान में द्वितीय वार्षिक अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सम्मेलन का दूसरा दिन सम्पन्न
भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध आयामों पर वैश्विक विद्वानों ने किया मंथन

ग्रेटर नोएडा:गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय (जीबीयू) , ग्रेटर नोएडा एवं आईकेएस हेरिटेज एसोसिएशन (इक्शा)के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित द्वितीय वार्षिक अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सम्मेलन–2026 के दूसरे दिन विभिन्न समानांतर तकनीकी सत्रों, पैनल चर्चाओं एवं प्लेनरी व्याख्यानों के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध आयामों पर गहन विमर्श किया गया। 24, 25 एवं 26 जुलाई 2026 तक आयोजित इस तीन दिवसीय सम्मेलन की थीम “आईकेएस: री-वीविंग द थ्रेड्स ऑफ नॉलेज” रखी गई है, जिसका उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा को समकालीन वैश्विक संदर्भों से जोड़ते हुए नई शैक्षणिक एवं शोध संभावनाओं को विकसित करना है।
सम्मेलन के दूसरे दिन तकनीकी सत्रों में समाज एवं संस्कृति, दर्शन – भारतीय दार्शनिक परंपराएँ: चेतना, ज्ञान एवं अधिगम, परफॉर्मिंग ट्रेडिशन्स एंड एस्थेटिक्स, ज्योतिष एवं गणित परंपराएँ तथा विज्ञान एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे विषयों पर देश-विदेश के शोधार्थियों एवं विशेषज्ञों ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए।
इन सत्रों की अध्यक्षता क्रमशः प्रो. ज्योतिर्मय त्रिपाठी (आईआईटी मद्रास), प्रो. रजनीश मिश्रा (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय), प्रो. नीरजा गुप्ता (कुलपति, गुजरात विश्वविद्यालय), प्रो. सी. एस. योगानंद (विद्याशिल्प विश्वविद्यालय, बेंगलुरु) तथा प्रो. हर्षा सिम्हा (आईआईएसटी, तिरुवनंतपुरम) ने की।
सम्मेलन के अंतर्गत आयोजित “स्वास्थ्य एवं कल्याण ” विषयक पैनल चर्चा में प्रो. राममनोहर पुथियेदथ (अमृता विश्व विद्यापीठम) ने मॉडरेटर की भूमिका निभाई। इस सत्र में गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राणा प्रताप सिंह तथा सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के प्रो. भूषण पटवर्धन ने भारतीय ज्ञान परंपरा आधारित स्वास्थ्य, समग्र शिक्षा एवं मानव कल्याण के विभिन्न आयामों पर अपने विचार व्यक्त किए। अपने वक्तव्य में प्रो. राणा प्रताप सिंह ने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली मानवता के समग्र कल्याण, वैज्ञानिक चिंतन, पर्यावरणीय संतुलन और सतत विकास की सुदृढ़ आधारशिला है। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय ज्ञान परंपरा, विशेषकर आयुर्वेद, को आधुनिक अनुसंधान, नवाचार और प्रौद्योगिकी के साथ समन्वित कर वैश्विक स्तर पर स्थापित किया जाए।उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि लगभग छह वर्ष पूर्व उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में आयुर्वेद और आधुनिक जीवविज्ञान के समन्वय से “आयुर्वेद बायोलॉजी” विषय की शुरुआत की थी। इस पहल को व्यापक शैक्षणिक सराहना मिली। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय में भी इसी शैक्षणिक सत्र से “आयुर्वेद बायोलॉजी” विषय का अध्ययन प्रारंभ किया जा रहा है, जिससे विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान के समन्वित अध्ययन का अवसर प्राप्त होगा।
दूसरे आयोजित प्लेनरी व्याख्यान में प्रो. स्थनेश्वर तिमलसिना, निर्मल के. एवं ऑगस्टिना मैट्टो चेयर ऑफ क्लासिकल इंडिक ह्यूमैनिटीज, डिपार्टमेंट ऑफ एशियन एंड एशियन अमेरिकन स्टडीज़ ने “डाइवरसीफ़ाइंग इंडिक फिलोसॉफिकल थिंकिंग : हूज थिंकिंग ,हाउ एंड इन व्हिच स्पेस ? ” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने भारतीय दार्शनिक चिंतन की विविधता, उसकी समावेशी प्रकृति तथा वैश्विक बौद्धिक विमर्श में उसकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।
तीसरे आयोजित तकनीकी सत्रों में एपिस्टेमोलॉजी एंड कॉग्निटिव फ्रेमवर्क्स तथा साइंस, टेक्नोलॉजी एंड आईकेएस विषयों पर शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। इन सत्रों की अध्यक्षता क्रमशः प्रो. एम. एस. चैत्रा, निदेशक, फाउंडेशन फॉर स्टडी ऑफ इंडियन कल्चर, बेंगलुरु तथा डॉ. मृत्तुंजय गुहा मजूमदार, स्कूल ऑफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, अमृता विश्व विद्यापीठम, फरीदाबाद ने की।
साथ ही अगले सत्रों में उपनिवेशवादी प्रभावों से मुक्ति, सार्वजनिक विमर्श एवं भारतीय ज्ञान परंपरा (आईकेएस) और धर्म, सतत विकास एवं सार्वजनिक नीति पर भी प्लेनरी व्याख्यान का आयोजन किया गया |
तीन दिवसीय सम्मेलन का समापन 26 जुलाई 2026 को विभिन्न तकनीकी सत्रों, समापन समारोह तथा भविष्य की सहयोगात्मक शोध पहलों की घोषणाओं के साथ होगा। सम्मेलन में भारत सहित अनेक देशों के शिक्षाविद, वैज्ञानिक, शोधकर्ता एवं विद्यार्थी भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध विषयों पर अपने विचार एवं शोध प्रस्तुत कर रहे हैं।






