लोकतंत्र में निर्णय जनोन्माद से नहीं, संविधान और तथ्यों से होने चाहिए-भगवत प्रसाद शर्मा

ग्रेटर नोएडा:केंद्रीय शिक्षा मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान जी का इस्तीफा मेरे लिए अत्यंत वेदनापूर्ण एवं लोकतांत्रिक दृष्टि से गंभीर चिंता का विषय है। एक जनप्रतिनिधि एवं सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्ति के रूप में मेरा स्पष्ट मत है कि किसी भी संवैधानिक पदाधिकारी के कार्य, उत्तरदायित्व और निर्णयों का मूल्यांकन क्षणिक जनाक्रोश, राजनीतिक दबाव अथवा भीड़-जनित विमर्श के आधार पर नहीं, बल्कि प्रमाणित तथ्यों, विधिसम्मत जांच तथा संविधान प्रदत्त प्रक्रियाओं के अनुरूप किया जाना चाहिए।

श्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने कार्यकाल में भारतीय शिक्षा व्यवस्था को अधिक समावेशी, प्रौद्योगिकी-सक्षम, अनुसंधान-केंद्रित एवं वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप बनाने के उद्देश्य से अनेक महत्त्वपूर्ण पहल कीं। स्वाभाविक है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) सहित कुछ विषयों पर मतभेद और आलोचनाएँ भी सामने आईं। लोकतंत्र में असहमति का सम्मान होना चाहिए, किंतु असहमति का समाधान संवैधानिक संस्थाओं और संवाद की प्रक्रिया से होना चाहिए, न कि ऐसे वातावरण में जहाँ जनदबाव ही निर्णय का प्रमुख आधार बन जाए।
यदि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में किसी मंत्री अथवा संवैधानिक पदाधिकारी का भविष्य केवल सड़क पर उत्पन्न दबाव से निर्धारित होने लगे, तो यह परिपाटी शासन-प्रणाली की संस्थागत स्थिरता, प्रशासनिक स्वायत्तता तथा विधि के शासन के लिए दीर्घकालिक चुनौती बन सकती है। लोकतंत्र का मूल तत्व जनसरोकारों का सम्मान अवश्य है, परंतु उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है संविधान की सर्वोच्चता और संस्थाओं की गरिमा।
यह भी आवश्यक है कि राष्ट्रविरोधी, विघटनकारी अथवा अराजक प्रवृत्तियाँ किसी भी लोकतांत्रिक परिस्थिति का दुरुपयोग कर राजनीतिक एवं वैचारिक अस्थिरता उत्पन्न करने का प्रयास न कर सकें। इसलिए प्रत्येक नागरिक, राजनीतिक दल और लोकतांत्रिक संस्था का दायित्व है कि वह राष्ट्रहित, सामाजिक समरसता तथा संवैधानिक मूल्यों को सर्वोपरि रखते हुए संयम, विवेक और उत्तरदायित्व का परिचय दे।
भारत का लोकतंत्र विश्व का सबसे सशक्त लोकतंत्र है। इसकी शक्ति भीड़ के शोर में नहीं, बल्कि संविधान की मर्यादा, विधि के शासन, संस्थागत निष्पक्षता और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व में निहित है। इसलिए प्रत्येक निर्णय ऐसा होना चाहिए जो न्याय, तथ्य, संवैधानिक प्रक्रिया और राष्ट्रहित—इन चारों स्तंभों पर समान रूप से आधारित हो।
राष्ट्र सर्वोपरि है, संविधान सर्वोच्च है और लोकतंत्र की गरिमा अक्षुण्ण रहनी चाहिए।

भागवत प्रसाद शर्मा की कलम से






