विषय शस्त्र पूजन नहीं, सनातनी समाज में पोषित होता एक आत्मीय बंधन – दिव्य अग्रवाल (लेखक व विचारक)

चिंतन:इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्रिंट मीडिया सभी ने अपने अपने दृष्टिकोण से बेंती राजभवन कुंडा में आयोजित शस्त्र पूजन के समाचार को प्रकाशित किया लेकिन मूल बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।
आज के समय में अपने रिश्तेदारों के घर जा जाकर निमंत्रण देने पर भी पारिवारिक कार्यक्रम में लोग नहीं पहुँचते तो फिर कुंडा के राजभवन बेंती में ऐसा क्या है जो बिना किसी औपचारिकता के विजयदशमी के दिन राजा भैया द्वारा आयोजित शस्त्र पूजन में लोग इस प्रकार सम्मिलित होते हैं जैसे यह उनके घर की व्यक्तिगत पूजा हो, क्या मीडिया या अन्य बुद्धिजीवी राजा भैया और उनके स्नेहीजनों के इस आत्मीय संबंध का आंकलन कर सकते हैं।
यकीन मानिए साहब वहां पर एकत्रित जनसमूह में जो धैर्यता,अनुशासन और समर्पण था उसकी कल्पना किसी निजी कार्यक्रम में भी नहीं की जा सकती जबकि यह तो सार्वजनिक कार्यक्रम था। धर्म, शौर्यता और पुरुषार्थ की दृष्टि से सनातन में एक बात कही जाती है की युद्ध हो या शक्ति प्रदर्शन इसके निमंत्रण नहीं भेजे जाते अपने लोग स्वतः चले आते हैं यह बात छत्रपति शिवाजी महाराज के समय काल में देखि जाती थी और अब जिस प्रकार राजा भैया सनातन और हिन्दू राष्ट्र के मार्ग पर चल पड़ें हैं लगता है ईश्वर राजा भैया और उनके स्नेहीजनो के माध्यम से कुछ तो बदलाव करवाना चाहते हैं अन्यथा एक पारिवारिक शस्त्र पूजन की परम्परा में इतना समर्पण अकल्पनीय है।
राजा भैया एकल व्यक्ति की छवि से परिवर्तित होकर एक विचार के रूप में सनातनी समाज में स्थापित होते जा रहे हैं जिसकी शक्ति इस बार से प्रमाणित होती है की राजा भैया ने सार्वजिनक रूप से कहा की इस आयोजन में सम्मिलित एक एक व्यक्ति हमारा परिवार है और जो यहाँ शस्त्र रखें हैं वह तो हाथी के दिखावे वाले दांतो के समकक्ष मात्र हैं खाने के दांत तो अभी बाकी हैं।






