अंतिम सांस के बाद भी जीवन बचाने की राह दिखा गए राधेलाल गर्ग
नेत्रदान और देहदान कर समाज को दिया मानवता का संदेश, परिजनों ने पूरी की वर्षों पुरानी अंतिम इच्छा

बिलासपुर:जीवन में इंसान बहुत कुछ अपने लिए करता है, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो मृत्यु के बाद भी समाज के लिए उपयोगी बने रहने का संकल्प लेते हैं। नोएडा सेक्टर-48 निवासी राधेलाल गर्ग ऐसे ही प्रेरणादायी व्यक्तित्व रहे, जिन्होंने जीवन रहते ही मृत्यु के बाद अपने नेत्र और देहदान का संकल्प लिया था। निधन के बाद उनके परिजनों ने उनकी अंतिम इच्छा को पूरा करते हुए नेत्रदान और देहदान कर मानवता की मिसाल पेश की।
राधेलाल गर्ग मूल रूप से दादरी क्षेत्र के निवासी थे और लंबे समय तक भारत विकास परिषद परिवार से जुड़े रहे। देहदान एवं अंगदान के प्रति जागरूकता कार्यक्रमों से प्रभावित होकर उन्होंने दधीचि देहदान समिति के माध्यम से मृत्यु के बाद प्रत्यारोपण योग्य अंग, नेत्र और शरीर दान करने का संकल्प लिया था। वह स्वयं भी सामाजिक मंचों पर देहदान और अंगदान की उपयोगिता पर चर्चा करते तथा लोगों को इस पुनीत कार्य के लिए प्रेरित करते थे।
कोरोना काल के आसपास वह अपने बच्चों के पास नोएडा सेक्टर-48 में रहने लगे। इसके बावजूद सामाजिक सरोकारों से उनका जुड़ाव कम नहीं हुआ। जब भी देहदान या अंगदान से संबंधित बैठक अथवा कार्यक्रम की योजना बनती, वह अपनी सक्रिय भागीदारी निभाते थे। उनका मानना था कि मृत्यु के बाद शरीर को मिट्टी में मिल जाने के बजाय यदि किसी विद्यार्थी की पढ़ाई, किसी मरीज के उपचार या किसी जरूरतमंद को रोशनी देने में लगाया जा सके, तो इससे बड़ी मानव सेवा क्या हो सकती है।
बताया गया कि 17 सितंबर को ब्रेन हेमरेज की शिकायत के बाद राधेलाल गर्ग को नोएडा के नियो अस्पताल में भर्ती कराया गया। चिकित्सकों के प्रयासों के बावजूद उनकी स्थिति में सुधार की उम्मीद धीरे-धीरे कम होती गई। इस दौरान उनके बच्चों ने उनके पूर्व संकल्प की जानकारी दधीचि देहदान समिति के पदाधिकारियों को दी और उनके अंतिम संकल्प को पूरा कराने में सहयोग मांगा।
निधन के बाद प्रक्रिया के दौरान गंभीर संक्रमण के कारण दान को लेकर कुछ कठिनाइयां सामने आईं। इसके बावजूद परिवार, समिति के सदस्यों और संबंधित संस्थाओं के प्रयासों से अंततः राधेलाल गर्ग की अंतिम इच्छा पूरी हो सकी। उनकी आंखें आई केयर अस्पताल, नोएडा को दान की गईं, जबकि उनका देहदान जिम्स, ग्रेटर नोएडा में चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान के लिए किया गया।
देहदान की प्रक्रिया को पूरा कराने में जिम्स के ऑटोनॉमी विभाग की एचओडी डॉ. रंजना का महत्वपूर्ण सहयोग रहा। वहीं दधीचि देहदान समिति के प्रांतीय अध्यक्ष प्रो. सतीश गर्ग के साथ राकेश अग्रवाल, माधुरी गर्ग, अनिल तायल और निश्चल तायल ने भी प्रक्रिया को पूरा कराने में सक्रिय भूमिका निभाई।
एक प्रयास से किसी को मिल सकती है रोशनी
नेत्रदान की प्रक्रिया में समग्र जैन समाज से जुड़े संजय जैन का विशेष सहयोग रहा। लंबे समय से नेत्रदान के क्षेत्र में कार्य कर रहे संजय जैन ने विभिन्न स्तरों पर प्रयास करते हुए आई केयर अस्पताल में नेत्रदान की प्रक्रिया पूरी कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण होने के बावजूद उन्होंने प्रयास जारी रखे और अंततः राधेलाल गर्ग के नेत्रदान का संकल्प पूरा हुआ।
परिजनों ने दिखाई संवेदनशीलता
राधेलाल गर्ग के पुत्र नितिन गर्ग, पुत्रियां शालिनी और गुंजन तथा नातिन संस्कृति गोयल सहित परिवार के अन्य सदस्य इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मौजूद रहे। अपनों को खोने का दुख होने के बावजूद परिवार ने भावनाओं से ऊपर उठकर उनके संकल्प को प्राथमिकता दी। परिजनों का यह निर्णय समाज के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश है कि अंगदान और देहदान केवल मृत्यु के बाद की प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानवता के प्रति जीवनभर निभाई जाने वाली जिम्मेदारी है।
समाज में जागरूकता की जरूरत
दधीचि देहदान समिति के पदाधिकारियों ने कहा कि अंगदान और देहदान को लेकर आज भी समाज में कई तरह की भ्रांतियां हैं। जागरूकता के अभाव में कई परिवार अंतिम समय में निर्णय नहीं ले पाते। राधेलाल गर्ग जैसे लोगों के संकल्प और उनके परिवार की संवेदनशीलता से समाज को सीख लेने की जरूरत है।
मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है, लेकिन मनुष्य अपने जाने के बाद भी किसी के जीवन में उम्मीद की किरण छोड़ सकता है। किसी की आंखें किसी दूसरे व्यक्ति की दुनिया रोशन कर सकती हैं और किसी की देह चिकित्सा के विद्यार्थियों के लिए ज्ञान का माध्यम बन सकती है। राधेलाल गर्ग का नेत्रदान और देहदान इसी मानवीय सोच का उदाहरण है।
उनका शरीर भले ही पंचतत्व में विलीन होने की सामान्य प्रक्रिया से अलग चिकित्सा सेवा को समर्पित हुआ, लेकिन उनका संकल्प समाज में लंबे समय तक जीवित रहेगा। उनका यह कार्य लोगों को यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि जीवन की अंतिम यात्रा भी किसी और के जीवन में नई शुरुआत का कारण बन सकती है।
रिपोर्टर घनश्याम पाल






