आस्था

हमारे देवी देवताओं का उपहास क्यों और कब तक-संजय गोयल

देवी देवताओं के स्वरूपों को नचाना भगवान का अपमान है ऐसे कार्यक्रमों का बहिष्कार होना चाहिए

बुलंदशहर: वरिष्ठ समाजसेवी सामाजिक चिंतक व आध्यात्मिक विचारधाराओं से भरपूर वरिष्ठ पत्रकार संजय गोयल समय-समय पर अपनी कलम के माध्यम से समाज में  फैली  कुरीतियों को लेकर आवाज उठते रहे हैं यदि इनके  विचारों पर गौर किया जाए तो कहीं तक इनकी बातों में सत्यता प्रतीत होती है व सभी को इस पर विचार करना चाहिए हम आए दिन देखते हैं कि जागरण या विभिन्न धार्मिक   आयोजनों में आयोजक अपने यहां पर पूर्णआस्था के साथ कार्यक्रम करता है वह इसकी जिम्मेदारी जागरण मंडली पर सौंप देता है पर यह हमारा दुर्भाग्य है कि मंडली में शामिल कलाकार अपने कुछ चंद स्वार्थ के चलते दिन पर दिन आस्था से खिलवाड़ करते हुए जागरण का स्वरूप बदलने पर लगे हैं, इसकी शुरुआत धीरे-धीरे फिल्मी गानों पर भजन गाने से हई जो धीरे-धीरे हमारे देवी-देवताओं  के स्वरूपों को नचाने पर पहुंच गई बदलती संस्कृति के चलते आध्यात्मिक संस्कारों से दूर आध्यात्मिक कार्यक्रम में शामिल होने वाली अधिकांश युवा पढ़ी को भी इसमें आनंद आने लगा जो मात्र इसको एक मनोरंजन का साधन समझते हैं यही हमारा दुर्भाग्य है,

आध्यात्मिक विचारधारा के लोगों को आगे बढ़कर इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी तभी हम सही अर्थों में भक्ति का आनद ले पाएंगे,

हम सभी वरिष्ठ पत्रकार संजय गोयल जी के प्रेरणास्त्रोत विचारों से सहमत है इनका कहना है कि देवी देवताओं के स्वरूपों को नचाना भगवान का अपमान है ऐसे कार्यक्रमों का बहिष्कार होना चाहिए

हम भजन कीर्तन में अपने देव भगवान देवी देवताओं आगे स्वयं खूब नाचें गाएं मंगल आनंद बनाएं लेकिन यह झांकी वाले जो हमारे देवी देवताओं का ही स्वरुप बनाकर कार्यक्रम में हमारे देवी देवताओं को नचाकर ठुमके लगवाते मोनो जैसे हमारे देवी देवताओं का मजाक और उनका उपहास बनबाते हैं इसका विरोध होना चाहिए हमारे धर्म और सनातन के लिए यह उचित नहीं

संजय गोयल ने बताया मैंने स्वयं देखा है सतों ने भी इसका विरोध किया है कई कार्यक्रम में जब झांकी वाले भगवान स्वरूप को नचाने के लिए लाये तो संत कार्यक्रम छोड़ उठ कर चले गए और उसका विरोध किया

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