“और मैं ज़िंदा रही” जीवन को जीवंत करती हुई ग़ज़ल संग्रह
लोकरंजन प्रकाशन एवं शहर समता के तत्वावधान में "और मैं जिन्दा रही" का लोकार्पण

प्रयागराज: आज हिन्दुस्तानी एकेडमी के गांधी सभागार में रचना सक्सेना की पाँचवी पुस्तक “और मैं जिंदा रही” का लोकार्पण रविनंन्दन सिंह की अध्यक्षता में हुआ। इसके पूर्व अध्यक्ष रविनन्दन सिंह, मुख्य अतिथि डाक्टर रवि मिश्र, विशिष्ट अतिथि डाक्टर सरोज सिंह, डाक्टर अमिता पांडेय, ज्योतिर्मय श्रीवास्तव माँ वाणी को पुष्पार्पण करके दीप प्रज्ज्वलित किया। इस अवसर पर सरिता मिश्रा और राजेश सिंह राज ने सरस्वती वंदना ने प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर अपने अध्यक्षीय संबोधन में रविनन्दन ने कहा कि गजल एक प्रकार का बर्तन है। गजल एक क्राफ्ट है। गजल के लिए बहर के अलावा गुनगुना कर गाने पर मीटर स्वतः बन जाता है। उन्होंने कहा की रचना जी ने बहुत मेहनत की है, उनके ग़ज़लो के बहुत से शेर बहुत ही ऊँचे दर्जे के है ।उन्होंने कई गजलों को उधृत किया। गजल फारसी, अरबी की मोहताज नहीं है, वरन् हिन्दी में भी लिखी जाती है। यह बहुत दूर तक जाती है। उन्होंने पुराने गजलकारों का उदाहरण भी दिया। गालिब तक ने अपना पैटर्न बदला और सरल शब्दावली का प्रयोग किया। यह आम लोगों से जुड़ती है।
प्रोफेसर रवि मिश्र ने कहा कि रचना सक्सेना जी का ग़ज़ल संग्रह और मैं ज़िंदा रही अपने आप में शिल्प पक्ष और भाव पक्ष का अद्भुत संतुलन है जीवन की विविधता को उन्होंने अपनी रचना में पूरी संजीदगी से जिया है स्त्रीमन जिस बारीकी से स्वयं और परिवेश से संवाद करती है उसकी अद्भुत मिसाल है यह ग़ज़ल संग्रह “और मैं ज़िंदा रही। इस अवसर पर प्रकाशक रंजन पांडेय और डाक्टर आदित्य सिंह ने पुस्तक पर अपने विचार व्यक्त किये। इस अवसर पर रचनाकार रचना सक्सेना ने पुस्तक की समीक्षा में अपने लिए किए सहयोगियों का आभार दिया और शीर्षक पर आधारित गजल सुनाई। ज्योतिर्मय श्रीवास्तव ने पुस्तक की गहराई पर प्रकाश डाला और गजल के इतिहास से इसे जोड़ा।
संजय सक्सेना ने कहा कि पुरुष प्रधान समाज ने महिलाओं को उचित स्थान नहीं दिया। इसके लिए संघर्ष करना पड़ा, जो रचना जी ने किया। प्रोफेसर अमिता पांडेय ने संस्कार पर जोर दिया। प्रोफेसर डाक्टर सरोज सिंह ने कहा कि मध्यवर्गीय महिला का हर झंझावातों से इस तरह की रचना उन्हें पूर्ण करता है। 101 गजलों के बीच स्त्री के दायित्व बोध को पूर्ण किया।
इस अवसर पर काव्य गोष्ठी के दूसरे सत्र में डाक्टर शम्भुनाथ त्रिपाठी अंशुल, डाक्टर भगवान प्रसाद उपाध्याय, पं. राकेश मालवीय मुस्कान, रचना सक्सेना, सयोजक संजय सक्सेना, प्रीता वाजपेई, मीरा सिन्हा, अभिषेक केसरवानी रवि, शिवराम मिश्र मुकुल मतवाला, मुक्तक सम्राट रामकैलाश पाल प्रयागी, डॉक्टर इंदु प्रकाश मिश्र जमदाग्निपुरी, के पी गिरि, विभा जी, सुनील दानिश, शाम्भवी द्विवेदी, अजय वर्मा साथी, एस पी श्रीवास्तव, संगीता श्रीवास्तव, मंजू लता नागेश, मोहिनी, सुधांश शुक्ला, अनिल मानव, चन्द्रप्रकाश श्रीवास्तव, मंजू लता नागेश, मुक्तक सम्राट राम कैलाश पाल, प्रयागी, प्रेमा राय, विजय लक्ष्मी विभा’, मधु, शाहिन खुश्बू, धीरेन्द्र सिंह नागा’, पीयूष मिश्र, केसब सक्सेना, रामकुमार कुशवाहा, डा. पुष्कर प्रधान, प्रभंजन त्रिपाठी, देवेन्द्र कुमार शुक्ल, ऋतु पाण्डेय त्रिधा, उर्वशी उपाध्याय, मनमोहन तन्हा आदि ने अपना काव्य पाठ किया।
शहर समता के संपादक उमेश श्रीवास्तव ने कार्यक्रम का कुशल संचालन किया।
द्वितीय सत्र का संचालन मनमोहन तन्हा ने बड़ी शिद्दत से किया।






