पुरूषोतम मास की चौरासी कोस परिक्रमा : आस्था, सेवा और दिव्य प्रेम का महापर्व-पंडित भगवत प्रसाद शर्मा
आस्था:“मोहि ब्रज बिसरत नाहीं” – भगवान श्रीकृष्ण के श्रीमुख से निकला यह भाव केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ब्रजभूमि की आध्यात्मिक चेतना का उद्घोष है। जिस पावन धरा की रज को देवता भी अपने मस्तक पर धारण करने की कामना करते हैं, जहाँ आज भी कण-कण में राधा-कृष्ण की दिव्य लीलाओं का स्पंदन अनुभव किया जा सकता है, उसी अलौकिक ब्रजधाम की चौरासी कोस परिक्रमा इस वर्ष पुरुषोत्तम मास में एक माह तक निरंतर सम्पन्न होकर 15 जून को पूर्णाहुति की ओर अग्रसर है।

यह परिक्रमा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा, लोकआस्था, सेवा-संस्कृति और निष्काम प्रेम का विराट महोत्सव है।
आत्मबोध की यात्रा है चौरासी कोस परिक्रमा
लगभग 84 कोस अर्थात 252 किलोमीटर में विस्तृत ब्रजमंडल में मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन, बरसाना, नन्दगाँव, गोकुल, महावन, बलदेव, राधाकुण्ड, श्यामकुण्ड, कामवन और मधुवन सहित भगवान श्रीकृष्ण की बाल एवं किशोर लीलाओं से जुड़े असंख्य वन, उपवन, सरोवर तथा तीर्थस्थल सम्मिलित हैं।

शास्त्रों में वर्णित द्वादश वन, चतुर्विंशति उपवन और अनगिनत लीलास्थल इस परिक्रमा के अभिन्न अंग हैं। प्रत्येक स्थल केवल भौगोलिक पहचान नहीं, बल्कि आध्यात्मिक स्मृतियों और दिव्य अनुभूतियों का जीवंत इतिहास है।
जहाँ धूल भी भक्ति है और प्रेम ही परमात्मा
पुरुषोत्तम मास में सम्पन्न होने वाली यह परिक्रमा श्रद्धा, समर्पण और प्रेम की अद्वितीय साधना मानी जाती है। एक माह तक चलने वाली इस आध्यात्मिक यात्रा के समापन पर श्रद्धालुओं की आँखों में भाव-विभोरता स्पष्ट दिखाई देती है।
किसी के अधरों पर “राधे-राधे” का मधुर उच्चारण होता है तो किसी की आँखों से ब्रज-वियोग के आँसू बह निकलते हैं। मानो प्रत्येक हृदय यही प्रार्थना कर रहा हो—“हे राधे, हे श्याम! पुनः कब बुलाओगे?”
ब्रज की परिक्रमा भले पूर्ण हो जाए, किन्तु उसका भाव जीवनभर साधक के हृदय में जीवित रहता है। यहाँ से लौटने वाला यात्री अपने साथ केवल स्मृतियाँ नहीं, बल्कि ब्रजरज की पवित्रता, मुरली की मधुर तान और राधारानी की कृपा का अमृत भी लेकर जाता है,

प्रेम के आगे नतमस्तक है स्वयं भगवान
विश्व में अनेक तीर्थ ऐसे हैं जहाँ मनुष्य भगवान की खोज में जाता है, किन्तु ब्रज वह अद्वितीय भूमि है जहाँ स्वयं भगवान प्रेम की तलाश में विचरते प्रतीत होते हैं।
यही वह धरा है जहाँ अनंत ब्रह्माण्डों के स्वामी यशोदा मैया की डाँट से भयभीत हो जाते हैं, जहाँ परमब्रह्म माखनचोर बनकर बाल-लीलाओं का आनंद लेते हैं, जहाँ सर्वशक्तिमान भगवान ग्वालबालों के साथ धूल में खेलते हैं और जहाँ श्रीराधा के निष्कलुष प्रेम के सम्मुख स्वयं श्रीकृष्ण भी अपने को ऋणी अनुभव करते हैं।
इसी भाव को संतों ने इन शब्दों में व्यक्त किया है
“तीर्थ अनेक, पर ब्रज अनूप।
यहाँ प्रेम ही परम स्वरूप॥”
ब्रजरज : दिव्यता का जीवंत प्रतीक
ब्रजवासियों के लिए ब्रज की रज मात्र मिट्टी नहीं, बल्कि दिव्यता का साक्षात् स्वरूप है। यही वह रज है जो श्रीकृष्ण के चरणों से पावन हुई, जिसमें श्रीराधा की पायलें झनकीं और जिसमें गोपियों के प्रेमाश्रु समाहित हैं।
जब श्रद्धालु नंगे पाँव इस पावन धरा पर चलते हैं, तब वे केवल दूरी नहीं नापते, बल्कि अपने अहंकार का विसर्जन भी करते हैं।
“ब्रज की रज मस्तक चढ़े, मिट जाए अभिमान।
राधा नाम हृदय बसे, मिल जाए भगवान॥”
भक्ति, सेवा और समर्पण का अद्भुत संगम

इस वर्ष की परिक्रमा ने सम्पूर्ण ब्रजभूमि को एक जीवंत आध्यात्मिक उत्सव में परिवर्तित कर दिया। प्रातःकालीन मंगला आरती, अखंड संकीर्तन, भागवत कथा, संतवाणी और भजन-मंडलियों की मधुर स्वर-लहरियों ने वातावरण को भक्तिमय बनाए रखा।
इसके साथ ही सेवा के अनेक प्रेरणादायी दृश्य भी देखने को मिले। कहीं ब्रजवासी थके यात्रियों के चरण धोते दिखाई दिए, कहीं निःस्वार्थ जलसेवा और विशाल भंडारों की व्यवस्था की गई। युवा श्रद्धालु वृद्धजनों को सहारा देते नजर आए, तो छोटे-छोटे बालक हाथ जोड़कर यात्रियों का स्वागत करते दिखे।
ऐसा प्रतीत होता था मानो सम्पूर्ण ब्रजभूमि स्वयं श्रद्धालुओं को अपनी गोद में लेकर चल रही हो।
दिव्यांग श्रद्धालुओं की आस्था बनी प्रेरणा
इस परिक्रमा का सबसे भावस्पर्शी पक्ष दिव्यांग श्रद्धालुओं की अटूट श्रद्धा और संकल्प रहा। शारीरिक चुनौतियों के बावजूद उनका उत्साह और विश्वास सभी के लिए प्रेरणास्रोत बना।

किसी के कदम दुर्बल थे, किन्तु श्रद्धा अटल थी। किसी की दृष्टि क्षीण थी, पर भक्ति प्रखर थी। किसी का शरीर थक गया था, किन्तु “राधे-राधे” का संकीर्तन उसे निरंतर आगे बढ़ाता रहा।
उनकी साधना यह संदेश देती है कि ब्रज तक पहुँचने का मार्ग केवल पैरों से नहीं, बल्कि श्रद्धा और समर्पण से तय होता है।
सेवा धर्म : ब्रज संस्कृति की आत्मा
ब्रज की पहचान केवल उसके मंदिरों और तीर्थों से नहीं, बल्कि उसकी लोकसंस्कृति और सेवा-भाव से भी है। यहाँ सेवा कर्तव्य नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक संस्कार है।
ब्रजवासी श्रद्धालुओं में अतिथि नहीं, बल्कि ठाकुरजी का स्वरूप देखते हैं। कोई जल पिलाता है, कोई भोजन कराता है, कोई विश्राम की व्यवस्था करता है, कोई औषधि उपलब्ध कराता है और कोई केवल “राधे-राधे” कहकर थके मन में नई ऊर्जा का संचार कर देता है।
यही आत्मीयता और सहजता ब्रज को विश्व के अन्य तीर्थों से विशिष्ट बनाती है।
चौरासी कोस परिक्रमा का आध्यात्मिक संदेश
सनातन मान्यता के अनुसार जीव 84 लाख योनियों में भटकता है। ब्रज की चौरासी कोस परिक्रमा इस सांसारिक चक्र से मुक्ति का प्रतीक मानी जाती है।
यह परिक्रमा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, आत्मबोध और समर्पण की साधना है। यह बताती है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य प्रेम, सेवा और भक्ति के माध्यम से परमात्मा से जुड़ना है।
जब परिक्रमा पूर्ण होती है…
एक माह की कठिन साधना के पश्चात जब श्रद्धालु परिक्रमा पूर्ण करता है, तब उसके चेहरे पर थकान के साथ एक अद्भुत आध्यात्मिक संतोष भी दिखाई देता है। उसे अनुभव होता है मानो जीवन का कोई अधूरा अध्याय पूर्ण हो गया हो, मन का कोई बोझ उतर गया हो और राधारानी की कृपा उसके जीवन में अवतरित हो गई हो।
उस समय बहने वाले आँसू दुःख के नहीं, बल्कि ब्रज-वियोग के होते हैं। क्योंकि जो एक बार ब्रज के प्रेम में डूब जाता है, वह जीवनभर उससे विमुख नहीं हो पाता।
प्रेम ही ब्रज का अंतिम संदेश
ब्रज हमें सिखाता है कि भगवान को केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि प्रेम से पाया जा सकता है। विद्वता से अधिक महत्त्व सरलता का है, वैभव से अधिक महत्त्व सेवा का है और अधिकार से अधिक महत्त्व समर्पण का है।
संतों ने ठीक ही कहा है—
“वैदिक ज्ञान जहाँ रुक जाता है,
वहीं से ब्रज का प्रेम प्रारम्भ होता है।”
निष्कर्ष
पुरुषोत्तम मास की इस दिव्य चौरासी कोस परिक्रमा की पूर्णता पर ब्रजभूमि, ब्रजरज, संत-महात्माओं, ब्रजवासियों तथा उन लाखों श्रद्धालुओं को कोटिशः नमन, जिनकी निष्कलुष भक्ति ने एक बार पुनः यह सिद्ध कर दिया है कि कलियुग में भी प्रेम जीवित है, श्रद्धा जीवित है, भक्ति जीवित है और ब्रज आज भी अपनी आध्यात्मिक चेतना के साथ जीवंत है।
लेखक परिचय -पंडित भगवत प्रसाद शर्मा
(मीडिया एक्जीक्यूटिव एवं स्वतंत्र लेखक)
मूल निवास : ग्राम खाम्बी (खम्बवन), ब्रज क्षेत्र
सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक विषयों पर आपका निरंतर लेखन प्रकाशित होता रहा है। ब्रज संस्कृति, श्रीकृष्ण भक्ति और सनातन परंपराओं पर आपकी विशेष रुचि एवं गहन अध्ययन है। आपके लेखों में आस्था, अनुभूति और सांस्कृतिक चेतना का सजीव समन्वय दिखाई देता है।






