शिक्षण संस्थान

परीक्षा – परिणाम, अपेक्षाएँ और बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य-हमारी सामूहिक जिम्मेदारी

दनकौर:आज के समय में परीक्षा परिणाम केवल शैक्षिक रूप से एक कक्षा स्तर से दूसरे कक्षा स्तर मेन प्रोन्नति एवं अंकों का मूल्यांकन नहीं रह गए हैं, बल्कि वे बच्चों की क्षमता निर्धारण, भविष्य और सामाजिक प्रतिष्ठा का मानदंड रूप लेते जा रहे हैं। जैसे-जैसे परिणाम घोषित हो रहे हैं, एक ओर कई बच्चे सफलता का आनंद ले रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ बच्चे अपेक्षाओं के अनुरूप परिणाम न आने के कारण गहरे मानसिक संघर्ष से गुजर रहे हैं। यह संघर्ष केवल व्यक्तिगत परीक्षा परिणाम नहीं होता, बल्कि परिवार, समाज और शिक्षा व्यवस्था के दबावों का सम्मिलित परिणाम होता है।

जब कोई बच्चा अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं कर पाता, तो उसके मन में हीनता, असफलता और निराशा के भाव उत्पन्न होते हैं। कई बार ये भाव इतने गहरे हो जाते हैं कि बच्चा स्वयं को दूसरों से कमतर समझने लगता है। यही वह समय होता है जब नकारात्मक विचार जन्म लेते हैं—“मैं किसी काम का नहीं हूँ”, “अब मेरा भविष्य समाप्त हो गया”, “मैंने सबको निराश कर दिया” “मै समाज में मुँह दिखाने लायक नही रहा” मेरे कारण से मेरे मम्मी पापा का सर समाज में नीचे हो गया” आदि। यदि इन विचारों को समय रहते समझा और संभाला न जाए, तो ये गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का रूप ले सकते हैं।

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि जब कोई बच्चा नकारात्मक व्यवहार अथवा आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठाता है, तो क्या वास्तव में उसका कारण केवल परीक्षा परिणाम होता है? या फिर यह हमारी सामूहिक विफलता का परिणाम होता है? सच यह है कि किसी भी बच्चे का ऐसा कदम उठाना केवल उसकी व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, बल्कि हमारे समाज, परिवार और शिक्षा प्रणाली की संवेदनहीनता एवं हमारे अपने जिम्मेदारीयों के निर्वहन की असफलता को भी दर्शाता है।

इसमें अभिभावकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। कई बार माता-पिता अनजाने में अपनी अधूरी इच्छाओं और अपेक्षाओं का बोझ बच्चों पर डाल देते हैं। बच्चों की तुलना दूसरों से करना, केवल अंकों के आधार पर उनकी योग्यता तय करना, या असफलता पर कठोर प्रतिक्रिया देना—ये सभी व्यवहार बच्चों के आत्मविश्वास को तोड़ते हैं और उन्हें नकारात्मक व्यवहार जैसे कठोर कदम उठाने के लिए मजबूर करता हैं । अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों के प्रयासों की सराहना करें, उन्हें बिना शर्त स्वीकार करें और यह समझाएँ कि असफलता जीवन का एक हिस्सा है, परीक्षा का परिणाम केवल जीवन के एक पहलू शैक्षिक तैयारी का प्रदर्शन हैं न जीवन के हार्दिक एक पहलू का प्रदर्शन न कि जीवन का अंत।

शिक्षकों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। शिक्षक केवल ज्ञान देने वाले नहीं, बल्कि मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत होते हैं। उन्हें चाहिए कि वे बच्चों में सीखने की जिज्ञासा विकसित करें, न कि केवल अंकों की दौड़ में उन्हें धकेलें। कमजोर प्रदर्शन करने वाले बच्चों को प्रोत्साहित करना, उनकी समस्याओं को समझना और उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाना शिक्षकों का कर्तव्य है।

परिवार और समाज की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। अक्सर रिश्तेदार और समाज के लोग बच्चों के परिणामों को लेकर अनावश्यक दबाव बनाते हैं—“कितने नंबर आए?”, उसके बच्चे के तो इतने अंक आए हैं” “फलां के बच्चे से कम क्यों आए?”—ऐसे सवाल बच्चों के मन में हीनता और तनाव पैदा करते हैं। समाज को अपनी सोच बदलनी होगी और यह समझना होगा कि हर बच्चा अद्वितीय है उसकी क्षमाताएं अलग-अलग क्षेत्र में हो सकती हैं और उसकी सफलता का मापदंड अलग हो सकता है।

मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। बच्चों को यह सिखाना जरूरी है कि जीवन में असफलता का सामना कैसे किया जाए, तनाव को कैसे नियंत्रित किया जाए और सकारात्मक सोच कैसे विकसित की जाए। इसके साथ ही, यदि किसी बच्चे में अवसाद, चिंता या आत्मघाती विचारों के संकेत दिखाई दें, तो तुरंत प्रशिक्षित मनोविशेषज्ञ (Clinical Psychologists ) की सहायता लेना आवश्यक है।

अंततः, हमें यह स्वीकार करना होगा कि एक बच्चे की असफलता अथवा आत्महत्या केवल उसकी व्यक्तिगत असफलता नहीं, बल्कि हमारे सामूहिक दृष्टिकोण की विफलता है। यदि हम सच में इस समस्या को रोकना एवं स्थायी समाधान चाहते हैं, तो हमें अपने नजरिए को बदलना होगा—अंकों से ज्यादा बच्चों के व्यक्तिगत क्षमाता, मानसिक स्वास्थ्य और खुशहाली को प्राथमिकता देनी होगी।

हमें यह आत्मसात करना पड़ेगा कि हर बच्चा महत्वपूर्ण है, हर बच्चे का हर प्रयास मूल्यवान है अपेक्षाओं के अनुरूप परिणाम प्राप्त नहीं करना कोई असफलता नही हैं बल्कि किए गए प्रयास का सकारात्मक प्रदर्शन हैं जो उसे अपने प्रयास को जारी रखने एवं और बढ़ाने की प्रेरणा हैं साथ ही कोई भी असफलता एक नई शुरुआत का अवसर प्रदान करती है। हमें बच्चों को यह विश्वास दिलाना होगा कि उनका जीवन किसी भी परीक्षा परिणाम से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। तभी हम एक स्वस्थ, संवेदनशील और समर्थ समाज का निर्माण कर पाएंगे।

 

वेद प्रकाश मौर्य

(क्लिनिकल साइकोलॉजीस्ट)

प्रवक्ता – मनोविज्ञान,

जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान, दनकौर, गौतमबुद्ध नगर l

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