अक्षरों में हिंदी का गौरव, काव्य में भारत की आत्मा -डॉ. भगवत प्रसाद शर्मा “साहित्य रत्न सम्मान” से अलंकृत
मातृभाषा हिंदी के मान-सम्मान की काव्य साधना को मिला सम्मान, डॉ. भगवत प्रसाद शर्मा “साहित्य रत्न” से अलंकृत

ग्रेटर नोएडा: मातृभाषा हिंदी के प्रति अगाध अनुराग, भारतीय संस्कृति के प्रति गौरव-बोध तथा अपनी उत्कृष्ट काव्य-रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना को मुखर स्वर प्रदान करने वाले साहित्यकार एवं मीडिया एक्जीक्यूटिव डॉ. भगवत प्रसाद शर्मा को शिला अक्षर फाउंडेशन, दिल्ली द्वारा प्रतिष्ठित “साहित्य रत्न सम्मान” से अलंकृत किया गया। यह सम्मान उनकी साहित्यिक साधना, हिंदी भाषा के प्रति समर्पण और अपनी रचनाधर्मिता के माध्यम से भारतीय जीवन-मूल्यों को जनमानस तक पहुँचाने के रचनात्मक अवदान का अभिनंदन है।
डॉ. भगवत प्रसाद शर्मा की काव्य-रचनाओं में हिंदी के प्रति आत्मीय समर्पण के साथ राष्ट्रप्रेम, मातृभूमि की माटी की सुगंध, वीरों के अतुलनीय त्याग, मातृशक्ति का गौरव, भारतीय संस्कारों की गरिमा तथा सांस्कृतिक अस्मिता की सशक्त अभिव्यक्ति दिखाई देती है। उनकी कविताएँ संवेदना और सरोकार का ऐसा समन्वय प्रस्तुत करती हैं, जिसमें भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम न रहकर संस्कार, संस्कृति और राष्ट्रचेतना की संवाहक बन जाती है। उनके प्रभावपूर्ण काव्य-पाठ ने साहित्य-प्रेमियों को हिंदी के प्रति आत्मीयता और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का संदेश दिया।
शिला अक्षर फाउंडेशन हिंदी साहित्य और भारतीय संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन एवं वैश्विक प्रसार के लिए निरंतर सक्रिय संस्था के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बना रहा है। संस्था साहित्यकारों को साझा मंच उपलब्ध कराने के साथ राष्ट्रीय संगोष्ठियों, साहित्यिक परिचर्चाओं, काव्य-पाठ, पुस्तक-विमोचन, साहित्यकार सम्मान तथा विविध सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से सृजनशील प्रतिभाओं को प्रोत्साहित कर रही है।
शिला अक्षर फाउंडेशन की विशिष्ट उपलब्धियों में विदेशी धरती पर हिंदी और भारतीय संस्कृति की गौरवपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराना विशेष रूप से उल्लेखनीय है। अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक आयोजनों में भारतीय रचनाकारों द्वारा हिंदी काव्य-पाठ के माध्यम से जब भारत की माटी की महक, मातृभूमि के प्रति अनुराग, वीरता की गाथाएँ, भारतीय नारी-शक्ति का गौरव और सनातन संस्कारों की उज्ज्वल छवि अभिव्यक्त होती है, तो वह आयोजन साहित्यिक गतिविधि की सीमाओं से ऊपर उठकर सांस्कृतिक संवाद का स्वरूप ग्रहण कर लेता है।
आज वैश्वीकरण के दौर में भाषायी एवं सांस्कृतिक अस्मिता के संरक्षण की आवश्यकता और भी बढ़ गई है। ऐसे समय में “शिला अक्षर फाउंडेशन” का यह प्रयास महत्वपूर्ण है कि हिंदी को केवल भारत की भाषा के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, संवेदना और सांस्कृतिक चेतना की प्रतिनिधि भाषा के रूप में विश्व समुदाय के समक्ष प्रतिष्ठित किया जाए।
डॉ. भगवत प्रसाद शर्मा को प्रदान किया गया “साहित्य रत्न सम्मान” इसी साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चेतना का सम्मान है। यह अलंकरण उनकी काव्य-साधना को मान्यता देने के साथ उन सभी रचनाकारों के लिए भी प्रेरणास्रोत है, जो मातृभाषा हिंदी की गरिमा को अपनी लेखनी और वाणी के माध्यम से अक्षुण्ण रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
शिला अक्षर फाउंडेशन दिल्ली की यह साहित्यिक यात्रा अक्षरों में भारतीय संस्कृति की सुगंध और हिंदी में भारत की आत्मा को संजोकर विश्वभर तक पहुँचाने का सार्थक अभियान है। विदेशी धरा पर हिंदी की गूंज निश्चय ही उस अमर भारतीय परंपरा का उद्घोष है, जिसकी जड़ें अपनी मातृभूमि में गहरी हैं और जिसकी चेतना समूचे विश्व को आलोकित करने की सामर्थ्य रखती है।






