साहित्य जगत

वक्त के प्रवाह में सब कुछ बह जाता है- डाक्टर रश्मि गुप्ता की कलम से

वक्त के प्रवाह में सब कुछ बह जाता है –

पहले बचपन फिर जवानी उसके बाद बुढ़ापा आता है।

जो सिर्फ कभी किसी की बेटी थी,

अब वो किसी की बहू भी बन गयी है।

बहू बनने पर मायके के रंग को छोड़कर,

ससुराल के रंग में ढल गयी है।

और अब वो माँ के रूप में,

पहले से भी ज्यादा निखर गयी है।

पहले जो सिर्फ खुद को न संभाल पाती थी,

अब वो बेटी सारे परिवार को संभालती है।

एक औरत वक्त के साथ बदलते,

हर किरदार को बखूबी निभाती है।

उसकी ममता, प्यार और त्याग,

की खुश्बू से यह दुनिया महक जाती है।

बदलते किरदारों का यू ही जीवन में आना जाना है,

वक्त के प्रवाह में सभी को बह जाना है।

वक्त के प्रवाह में सभी को बह … जाना … है।

“कभी-कभी एहसास होता है, जिंदगी में भी कितना संघर्ष होता है, एक समय था जब हम होते थे, न खाने की खबर, न पढ़ने की चिंता, न ही काम का बोझ, न कमाने की चिंता, ये अपना अलग ही अंदाज था। आज बचपन छूटा, जिम्मेदारियां आ गईं, अब अपने बच्चों और बड़ों की फिक्र होने लगी… अभी नया मुकाम हासिल करना है, जिंदगी की कठिनाइयों को देखकर रुकना नहीं, मुस्कुराते हुए सफलता की शिखर पर पहुंचना है।”

डाक्टर रश्मि गुप्ता

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