वैश्वीकृत और तकनीकी दुनिया में बौद्ध मनोविज्ञान की प्रासंगिकता पर चार दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का समापन

ग्रेटर नोएडा:गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय (जीबीयू), ग्रेटर नोएडा में “ बौद्धधर्म इन ए ग्लोबलाइज्ड एंड टेक्नोलॉजाइज़्ड वर्ल्ड : इनसाइट फ्रॉम द बुद्धिस्ट साइंस ऑफ़ माइंड” विषय पर आयोजित चार दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का रविवार, 4 अक्टूबर 2026 को सफलतापूर्वक समापन हुआ। कार्यशाला का आयोजन जर्मनी के यूनिवर्सिटी ऑफ हीडलबर्ग और कर्मापा इंटरनेशनल बुद्धिस्ट इंस्टीट्यूट द्वारा गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, हिंदू कॉलेज तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सहयोग से किया गया।
कार्यशाला में विश्व के विभिन्न देशों से आए विद्वानों, शोधकर्ताओं और बौद्ध अध्ययन के विशेषज्ञों ने वैश्वीकरण, तकनीकी विकास तथा मानव कल्याण के समक्ष उत्पन्न समकालीन चुनौतियों के संदर्भ में बौद्ध दृष्टिकोण से मन, चेतना और मानवीय व्यवहार के अध्ययन पर व्यापक विचार-विमर्श किया।
समापन सत्र की अध्यक्षता जीबीयू के डीन अकादमिक्स एवं डीन, स्कूल ऑफ बुद्धिस्ट स्टडीज एंड सिविलाइजेशन, प्रो. राजीव वार्ष्णेय ने की। अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने ‘बौद्ध विज्ञान एवं मन’ की वर्तमान समय में प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वैश्वीकरण और तकनीकी रूप से तेजी से बदलती दुनिया में मन की प्रकृति, भावनाओं, चेतना और मानवीय व्यवहार को बौद्ध दृष्टिकोण से समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने बौद्ध मनोविज्ञान एवं दर्शन में निहित ज्ञान को समकालीन मानव जीवन और कल्याण के लिए उपयोगी बताया।
कार्यशाला के स्थानीय आयोजक, जीबीयू के निदेशक, अंतरराष्ट्रीय मामले एवं प्रमुख, स्कूल ऑफ बुद्धिस्ट स्टडीज एंड सिविलाइजेशन, डॉ. चिंतला वेंकट साईं सिवसाई ने स्वागत भाषण दिया। उन्होंने कार्यशाला के उद्देश्यों और इसके अकादमिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि बौद्ध परंपरा मानव चेतना, मानसिक अवस्थाओं, नैतिक आचरण तथा आंतरिक कल्याण को समझने के लिए एक समृद्ध विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण प्रदान करती है। उन्होंने समकालीन जीवन की चुनौतियों के समाधान में बौद्ध चिंतन की उपयोगिता पर भी प्रकाश डाला।
सम्मानित अतिथि प्रो. सी. उपेंद्र राव, स्कूल ऑफ संस्कृत एंड इंडिक स्टडीज, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने संस्कृत बौद्ध साहित्य और बौद्ध विज्ञान एवं मन के बीच संबंध पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने संस्कृत बौद्ध ग्रंथों में संरक्षित समृद्ध बौद्धिक परंपरा की चर्चा करते हुए बताया कि बौद्ध साहित्य और दर्शन में चेतना, संज्ञान तथा मानव मन की कार्यप्रणाली से संबंधित महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टियां उपलब्ध हैं। उन्होंने समकालीन संदर्भ में इन ग्रंथों और विचारों की निरंतर प्रासंगिकता पर भी बल दिया।
इस अवसर पर जर्मनी के यूनिवर्सिटी ऑफ हीडलबर्ग के डॉ. रॉल्फ शेरुमेन ने चार दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला की रिपोर्ट प्रस्तुत की। उन्होंने कार्यशाला के दौरान हुए अकादमिक विमर्श, विद्वानों के योगदान तथा प्रमुख विषयों पर विस्तार से जानकारी दी।
हीडलबर्ग विश्वविद्यालय, जर्मनी के दक्षिण-पूर्व एशियाई कार्यालय के प्रमुख डॉ. सुबूर ने विश्वविद्यालय के विभिन्न शैक्षणिक कार्यक्रमों और गतिविधियों की जानकारी साझा की तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बौद्ध अध्ययन और संबंधित अकादमिक गतिविधियों को बढ़ावा देने में विश्वविद्यालय की भूमिका पर प्रकाश डाला।
चार दिवसीय कार्यशाला में 10 देशों के विद्वानों ने सहभागिता की। अकादमिक सत्रों के दौरान कुल 26 शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए। शोध-पत्रों में बौद्ध दृष्टिकोण से मन, चेतना, नैतिकता, मानव कल्याण, वैश्वीकरण तथा तकनीकी परिवर्तन सहित विभिन्न विषयों के विविध आयामों पर चर्चा की गई।
कार्यशाला ने विभिन्न देशों और बौद्ध परंपराओं से जुड़े विद्वानों के बीच संवाद के लिए एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय अकादमिक मंच प्रदान किया। साथ ही, इस आयोजन से सहभागी संस्थानों के बीच शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक सहयोग को और मजबूत करने का अवसर मिला।
समापन सत्र के अंत में कार्यशाला के स्थानीय आयोजक डॉ. चिंतला वेंकट साईं सिवसाई ने धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने सहभागी संस्थानों, विद्वानों, अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों, विश्वविद्यालय के शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कार्यशाला की सफलता में उनके योगदान की सराहना की।






