विकास की दौड़ में विलुप्त होती करुणा: गौवंश संरक्षण की सामूहिक पुकार

भगवत प्रसाद शर्मा की कलम से
ग्रेटर नोएडा:भारतीय संस्कृति में गौवंश का स्थान अत्यंत पवित्र और सम्माननीय रहा है। गौ केवल एक पशु नहीं, बल्कि करुणा, सह-अस्तित्व और कृषि-आधारित जीवनशैली का प्रतीक है। किंतु आज के दौर में गौवंश की स्थिति चिंताजनक होती जा रही है। सड़कों पर भटकती, कचरे में भोजन तलाशती और दुर्घटनाओं का शिकार होती गौऊमाताएँ हमारे विकास मॉडल पर गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं।

इस समस्या के पीछे तीव्र शहरीकरण, चरागाहों का अभाव, पारंपरिक पशुपालन में कमी और प्रशासनिक उदासीनता जैसे कई कारण हैं। ग्रेटर नोएडा जैसे तेजी से विकसित होते शहरों में यह स्थिति और अधिक स्पष्ट दिखाई देती है, जहाँ आधुनिक अधोसंरचना के बीच संवेदनाएँ पीछे छूटती प्रतीत होती हैं।
समाधान के लिए ठोस और सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं। सबसे पहले, सुव्यवस्थित गौशालाओं की स्थापना और सुदृढ़ीकरण किया जाना चाहिए, जहाँ पर्याप्त स्थान, स्वच्छता, चारा और चिकित्सीय सुविधाएँ उपलब्ध हों। साथ ही, शहर के विभिन्न स्थानों पर जल-पात्रों और चारे की व्यवस्था सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
इसके साथ ही, सामाजिक भागीदारी इस अभियान की सफलता की कुंजी है। स्वैच्छिक संगठन, शिक्षण संस्थान, युवा वर्ग और स्थानीय नागरिक मिलकर इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों में करुणा और जिम्मेदारी की भावना विकसित की जानी चाहिए।
आधुनिक तकनीक का उपयोग भी सहायक सिद्ध हो सकता है, जैसे डिजिटल ट्रैकिंग और सामुदायिक सहयोग से संसाधनों का बेहतर प्रबंधन।
अंततः, गौवंश संरक्षण केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि हमारी मानवीयता और सामाजिक उत्तरदायित्व की कसौटी है। यदि हम आज संगठित होकर प्रयास करें, तो न केवल गौवंश की रक्षा संभव है, बल्कि हम एक अधिक संवेदनशील और जिम्मेदार समाज का निर्माण भी कर सकते हैं।
भगवत प्रसाद शर्मा ( वरिष्ठ सामाजिक चिंतक)



