राममय हुआ कालूपुरा-श्रद्धा, संस्कृति और राष्ट्रचेतना के साथ मनाई गई गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती
तुलसीदास जी का जीवन लोकमंगल, मर्यादा, धर्मनिष्ठा और भारतीय संस्कृति के संरक्षण का अनुपम संदेश : संत-महात्मा एवं विद्वान

गौतम बुद्ध नगर :मानस अवलोकन संस्था, कालूपुरा के तत्वावधान में बौद्ध मिशन कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, कालूपुरा में संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती श्रद्धा, भक्ति, आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रभावना के साथ भव्य रूप से मनाई गई। कार्यक्रम में संत-महात्माओं, विद्वानों, शिक्षाविदों, विद्यार्थियों तथा क्षेत्र के गणमान्य नागरिकों ने सहभागिता कर तुलसीदास जी के जीवन, कृतित्व और लोकमंगलकारी विचारों का स्मरण किया।
संत-महात्माओं एवं विद्वानों ने श्रीराम नाम की महिमा का गुणगान करते हुए कहा कि प्रभु श्रीराम की भक्ति मनुष्य के जीवन में सत्य, मर्यादा, करुणा, त्याग, कर्तव्य और सेवा जैसे सद्गुणों का संचार करती है। भगवान अपने भक्तों की उसी प्रकार रक्षा करते हैं, जिस प्रकार माता अपने अबोध शिशु की निरंतर चिंता और संरक्षण करती है।
वक्ताओं ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास जी केवल महान भक्त और कवि ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के अमर प्रहरी थे। उन्होंने अपने जीवन की विपरीत परिस्थितियों और कठिनाइयों के बीच भी धर्म, भक्ति और लोककल्याण का मार्ग नहीं छोड़ा। श्रीरामचरितमानस की रचना कर उन्होंने श्रीराम के आदर्श चरित्र को जन-जन तक पहुँचाया और भारतीय समाज को सत्य, धर्म, कर्तव्य, करुणा, त्याग, विनम्रता तथा परोपकार की प्रेरणा दी।
तुलसीदास जी के जीवन-दर्शन में श्रीराम मर्यादा, सत्यनिष्ठा, न्याय, वचनबद्धता और आदर्श जीवन के प्रतीक हैं। उनका प्रसिद्ध संदेश—“परहित सरिस धरम नहि दूजा”—यह बताता है कि मानव जीवन की सार्थकता केवल व्यक्तिगत सुख में नहीं, बल्कि दूसरों के कल्याण और सेवा में निहित है। इसी कारण श्रीरामचरितमानस केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारतीय समाज के लिए जीवन-मूल्यों, नैतिकता और सांस्कृतिक चेतना का अमूल्य लोकग्रंथ है।
राष्ट्र सर्वोपरि और भारतीय संस्कृति की रक्षा का संकल्प
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि भारत की संस्कृति “वसुधैव कुटुम्बकम्” की संस्कृति है। भारत सदैव शांति, सद्भाव और विश्वबंधुत्व का पक्षधर रहा है, किंतु राष्ट्र की सुरक्षा, संप्रभुता, अखंडता और गौरव की रक्षा प्रत्येक नागरिक का परम कर्तव्य है।
उन्होंने कहा कि “राष्ट्र सर्वोपरि” की भावना प्रत्येक भारतीय के हृदय में दृढ़ होनी चाहिए। अपनी मातृभूमि की आन, बान और शान तथा महान सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए हम सभी को सदैव तत्पर रहना चाहिए। राष्ट्रहित में आवश्यकता पड़ने पर सर्वोच्च त्याग के लिए तैयार रहना ही सच्ची राष्ट्रभक्ति है।
मानस अवलोकन संस्था के महासचिव श्री हरिओम शास्त्री जी ने बताया कि संस्था पिछले 27 वर्षों से राष्ट्रहित और समाजहित में भारतीय संस्कृति की महान परंपराओं एवं जीवन-मूल्यों को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य कर रही है। संस्था धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से देश की गौरवशाली विरासत को नई पीढ़ी से जोड़ने का निरंतर प्रयास कर रही है।
संस्था के संयोजक श्री संजय विमल देव जी ने कहा कि संस्था विशेष रूप से विद्यार्थियों और युवा पीढ़ी के चरित्र-निर्माण, संस्कार-विकास और सर्वांगीण उन्नयन की पक्षधर है। आज के विद्यार्थी ही कल के भारत के निर्माता हैं। इसलिए उन्हें महापुरुषों के जीवन, संघर्ष और आदर्शों से परिचित कराकर राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य के लिए तैयार करना संस्था का प्रमुख उद्देश्य है।
उन्होंने बताया कि संस्था के कार्यालय में विद्यार्थियों द्वारा नियमित रूप से श्रीरामचरितमानस का पाठ किया जाता है तथा प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को श्रीसुंदरकांड का पाठ आयोजित होता है। सत्संग के माध्यम से युवाओं को महापुरुषों के जीवन-चरित्र, भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और राष्ट्रसेवा की प्रेरणा दी जाती है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के विद्यार्थियों को उनकी शिक्षा के लिए सहायता राशि प्रदान कर उनके भविष्य को संवारने का भी प्रयास किया जाता है।
कार्यक्रम के समापन पर उपस्थित श्रद्धालुओं, विद्यार्थियों एवं गणमान्य नागरिकों ने भारतीय संस्कृति, राष्ट्र की एकता-अखंडता, सामाजिक सद्भाव, लोककल्याण और राष्ट्रसेवा के मूल्यों को जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लिया। पूरा वातावरण श्रीराम के जयघोष और भक्तिभाव से ओतप्रोत रहा।
रिपोर्टर भगवत प्रसाद शर्मा






