ग्रेटर नोएडा

‘वन्दे मातरम्’के 150 वर्ष पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

ग्रेटर नोएडा:गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के इतिहास एवं सभ्यता विभाग द्वारा अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के सहयोग से दिनांक 22 सितंबर 2026 को “वन्दे मातरम् के 150 वर्ष: प्रतिबंधित साहित्य, स्वाधीनता संग्राम और भारतीय राष्ट्रबोध” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय के कन्वेंशन सेंटर ऑडिटोरियम में किया गया। संगोष्ठी का उद्देश्य ‘वन्दे मातरम्’, प्रतिबंधित साहित्य, औपनिवेशिक सेंसरशिप तथा स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान भारतीय राष्ट्रबोध के निर्माण में साहित्य और मुद्रित माध्यमों की भूमिका पर विमर्श करना था।

कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति एवं मुख्य संरक्षक प्रो. राणा प्रताप सिंह के संरक्षण तथा मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान संकाय के अधिष्ठाता एवं संरक्षक प्रो. माधव गोविन्द के मार्गदर्शन में हुआ। इतिहास एवं सभ्यता विभाग की विभागाध्यक्ष एवं संगोष्ठी की संयोजक डॉ. रितिका जोशी ने कार्यक्रम की रूपरेखा एवं अकादमिक संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मुख्य अतिथि अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. बालमुकुंद पाण्डेय ने अपने संबोधन में इतिहास की समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इतिहास केवल अतीत का अध्ययन नहीं, बल्कि वर्तमान को समझने और भविष्य की दिशा को जानने का माध्यम भी है। ‘वन्दे मातरम्’ के संदर्भ में उन्होंने मातृभूमि की अवधारणा पर चर्चा करते हुए इसके ऐतिहासिक एवं वैचारिक स्वरूप को रेखांकित किया। उन्होंने 1896 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा ‘वन्दे मातरम्’ के सार्वजनिक गायन तथा 1905 के बंग-भंग विरोधी एवं स्वदेशी आंदोलन के दौरान इसके व्यापक राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रयोग का उल्लेख किया।

मुख्य वक्ता डॉ. नरेंद्र शुक्ला, प्रमुख, शोध एवं प्रकाशन प्रभाग, प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय, नई दिल्ली ने प्रतिबंधित साहित्य और भारतीय चेतना के संबंध पर विस्तार से विचार रखा। उन्होंने बताया कि औपनिवेशिक काल में साहित्य, समाचार-पत्र और मुद्रित शब्द राजनीतिक विचारों, असहमति तथा प्रतिरोध को व्यापक समाज तक पहुँचाने के महत्वपूर्ण साधन बने। उन्होंने ‘वन्दे मातरम्’ और बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के आनंदमठ के संबंध तथा औपनिवेशिक सेंसरशिप के विरुद्ध लेखकों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष को रेखांकित किया।

विभागाध्यक्ष डॉ. रितिका जोशी ने ‘वन्दे मातरम्’ के ऐतिहासिक एवं वैचारिक महत्व पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि औपनिवेशिक सत्ता समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं और मुद्रित माध्यमों की प्रभावशाली भूमिका से चिंतित थी। उन्होंने ‘वन्दे मातरम्’को औपनिवेशिक सत्ता के विरोध तथा राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति के महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में रेखांकित किया।

संकाय के अधिष्ठाता प्रो. माधव गोविन्द ने कहा कि ‘वन्दे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीयों में एकता और राष्ट्रीय चेतना को सुदृढ़ करने वाला महत्वपूर्ण माध्यम था। उन्होंने प्रतिबंधित साहित्य को स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान वैचारिक प्रतिरोध और राजनीतिक चेतना के प्रसार का महत्वपूर्ण साधन बताया।

कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. जीतेश द्वारा किया गया। संगोष्ठी में डॉ. ए. के. दुबे, डॉ. प्रदीप कुमार उपाध्याय, डॉ. रीना कपूर, आकाश अवस्थी, डॉ. उपेंद्र, डॉ. पवन, डॉ. अनुराधा तथा डॉ. देवेंद्र सहित विभाग के अन्य शिक्षक एवं शोधार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के आयोजन एवं व्यवस्थाओं में आयुष द्विवेदी, कुणाल सहित विद्यार्थियों ने सक्रिय सहयोग प्रदान किया। अंत में डॉ. रवि ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए मुख्य अतिथि, मुख्य वक्ता, विश्वविद्यालय प्रशासन, विभागीय सदस्यों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

संगोष्ठी में विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं शिक्षकों की सक्रिय सहभागिता रही और इस प्रकार यह कार्यक्रम भारतीय इतिहास, प्रतिबंधित साहित्य, स्वाधीनता संग्राम तथा राष्ट्रबोध से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों पर सार्थक अकादमिक संवाद का मंच बना।

Related Articles

Back to top button
error: Content is protected !!