साहित्य जगत

हिंदी की सुरभि से सुवासित हुआ वैश्विक साहित्यिक मंच

“विदेशी धरा पर हिंदी की सुगंध, साहित्यकारों ने छोड़ी भारतीय संस्कृति की अमिट छाप”

भारतीय ज्ञान-परंपरा की उज्ज्वल विरासत का हुआ भावपूर्ण स्मरण

डॉ. सुनीता शर्मा ने (मेलबर्न, ऑस्ट्रेलिया) से सुनाई मातृ भाषा हिन्दी की रचनाओं में भारतीय मनीषा की गौरवगाथा, लोकजीवन की सहजता। ग्रेटर नोएडा: हिंदी केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि भारत की चिरंतन चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता और समृद्ध ज्ञान-परंपरा की संवाहिका है। इसी भावबोध को केंद्र में रखते हुए शिला अक्षर फाउंडेशन के तत्वावधान में हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में ४ अक्टूबर २०२६ को अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन काव्य गोष्ठी का गरिमामय आयोजन किया गया। गोष्ठी का केंद्रीय विषय “हिंदी और भारतीय ज्ञान परंपरा : अतीत से भविष्य की ओर” रहा।

ऑनलाइन माध्यम से आयोजित इस साहित्यिक अनुष्ठान में भारत के विभिन्न नगरों के साथ विदेशों से जुड़े साहित्यकारों, कवियों, शिक्षाविदों एवं हिंदी अनुरागियों ने सहभागिता की। तकनीकी दूरियों को पार करते हुए यह आयोजन साहित्य, संवेदना और संस्कृति का ऐसा सेतु बना, जहाँ देश-देशांतर की सीमाएँ सिमट गईं और हिंदी की आत्मीयता ने सभी को एक सूत्र में बाँध दिया।

गोष्ठी में २७ से अधिक साहित्यकारों एवं रचनाकारों ने अपनी मौलिक रचनाओं का भावपूर्ण काव्य-पाठ किया। कविताओं में हिंदी के प्रति अगाध अनुराग, राष्ट्रप्रेम, भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का गौरव, प्रकृति-सौंदर्य, मानवीय करुणा तथा समकालीन सामाजिक सरोकारों की सशक्त अभिव्यक्ति दिखाई दी। रचनाकारों ने भारतीय ज्ञान-परंपरा की अमूल्य विरासत को भावी पीढ़ियों तक पहुँचाने का संकल्प भी स्वर दिया।

काव्य-पाठ के दौरान शब्द संवेदना, संस्कार और सांस्कृतिक स्मृति के जीवंत वाहक बनकर उभरे। रचनाओं में भारतीय मनीषा की गौरवगाथा, लोकजीवन की सहजता, राष्ट्र की माटी की सुगंध और मानवीय मूल्यों का सुंदर समन्वय दिखाई दिया। इससे यह संदेश भी मुखर हुआ कि हिंदी अपनी आत्मीयता और व्यापकता के माध्यम से विश्वभर में भारतीय संस्कृति को जोड़ने की अद्भुत क्षमता रखती है।

इस अवसर पर सीमा सक्सेना वर्णिका (कानपुर), मधुर कुलश्रेष्ठ (गुना), मानसिंह बघेल (गाजियाबाद), संतोष कुमार शर्मा ‘बाबा कानपुरी’ (नोएडा), डॉ. भगवत प्रसाद शर्मा (ग्रेटर नोएडा), डॉ. आरती वाजपेयी (लखनऊ), सौ. सोनाली सु. पेडणेकर (गोवा), डॉ. सुनीता शर्मा (मेलबर्न, ऑस्ट्रेलिया), डॉ. सतीश चतुर्वेदी (गुना), कुमार चंद्रहास (अलीगढ़), डॉ. अनीता त्रिपाठी (ग्रेटर नोएडा), डॉ. पूर्णिमा देसाई (गोवा), नीलम कुलश्रेष्ठ (गुना), डॉ. अनुज कुमार भार्गव (ग्रेटर नोएडा), डॉ. कविता विकास (नोएडा), डिल्लीराम शर्मा संग्रौला (काठमांडू, नेपाल), डॉ. पुष्पा कलाल (उदयपुर), विकास वर्मा (अलीगढ़), अपूर्वा दीक्षित (लखनऊ), ललित भूषण (गाजियाबाद), कुमार दत्त ‘कुमर’ (पलवल), अर्चना सिंह, अपर्णा भटनागर, श्रीमती सरिता जोशी, सरफराज नबाब, नीरज त्यागी तथा डॉ. ब्रजलता शर्मा (ग्रेटर नोएडा) ने अपनी सारगर्भित रचनाओं से साहित्यिक वातावरण को समृद्ध किया।

समापन अवसर पर डॉ. ब्रजलता शर्मा, डॉ. अनुज कुमार भार्गव एवं डॉ. कविता विकास ने सभी साहित्यकारों, कवियों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन हिंदी के प्रचार-प्रसार के साथ भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और मानवीय मूल्यों की ज्योति को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

फाउंडेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष आर. सी. शर्मा ने कहा कि वर्तमान वैश्विक परिवेश में अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ना समय की महती आवश्यकता है। साहित्य अतीत की अनुभूतियों को वर्तमान की चेतना से जोड़कर भविष्य का मार्ग प्रशस्त करता है। शिला अक्षर फाउंडेशन हिंदी तथा भारतीय ज्ञान-परंपरा के संरक्षण, संवर्धन और वैश्विक प्रसार के लिए निरंतर साहित्यिक गतिविधियों को गति देने के लिए प्रतिबद्ध है।

रिपोर्टर डा॰ भगवत प्रसाद शर्मा

 

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