आस्था

सीता नवमी: जनकसुता के जीवन से नारी गौरव का दिव्य उद्घोष”

“सीता नवमी: आदिशक्ति वैदेही का दिव्य प्राकट्य—नारी गरिमा, मर्यादा और आत्मबल का सनातन शंखनाद”

✍️ लेखकः-  भगवत प्रसाद शर्मा की कलम से

ग्रेटर नोएडा:भारतीय सभ्यता के चिरन्तन प्रवाह में कुछ ऐसे दिव्य आलोक-बिंदु हैं, जो केवल इतिहास नहीं, अपितु आदर्श-चेतना के रूप में युगों-युगों तक मानवता का मार्गदर्शन करते हैं। माता सीता—यह नाम केवल श्रद्धा का विषय नहीं, बल्कि शुचिता, धैर्य, त्याग और मर्यादा का सजीव प्रतिरूप है। ‘सीता नवमी’ का यह पावन पर्व उसी दिव्य प्राकट्य का स्मृति-उत्सव है, जो नारी के गौरव को दैवीय आयाम प्रदान करता है।

मिथिला के राजर्षि राजा जनक के यज्ञक्षेत्र से उद्भूत यह दिव्य सत्ता, वस्तुतः भूमि देवी की अंशावतारिणी मानी जाती हैं। उनका अवतरण किसी साधारण घटना का परिणाम नहीं, बल्कि यह धर्मसंस्थापनाय एक दिव्य संकल्प था। माता जानकी के जीवन का प्रत्येक क्षण यह उद्घोष करता है कि नारी केवल सौम्यता नहीं, बल्कि संकल्पशक्ति का भी मूर्तिमान स्वरूप है।

रामचरितमानस के अमर रचयिता गोस्वामी तुलसीदास ने माता सीता के महिमामय स्वरूप को जिस भाव-गाम्भीर्य से व्यक्त किया है, वह आज भी हृदय-प्रदेश को आंदोलित कर देता है—

“सिय राममय सब जग जानी।

करउँ प्रणाम जोरि जुग पानी॥”

यहाँ ‘सिय’ का प्रथम उच्चारण ही नारी के उस आद्यत्व को स्थापित करता है, जो सृष्टि के संतुलन का आधार है। यह चौपाई केवल भक्ति नहीं, बल्कि अद्वैत दर्शन की सजीव अनुभूति है।

जब श्री राम को वनगमन का दारुण प्रसंग प्राप्त हुआ, तब माता सीता ने जो निर्णय लिया, वह नारी की स्वाधीन चेतना और अटूट निष्ठा का अप्रतिम उदाहरण है—

“प्राणनाथ तुम्ह बिनु जग माहीं।

मो कहुँ सुखद कछु नहिं नाहीं॥”

यहाँ प्रेम केवल भाव नहीं, बल्कि आत्मिक एकत्व का घोष है। यह नारी की उस चेतना का उद्घाटन है, जो विपत्ति में भी अपने धर्म से विचलित नहीं होती।

अशोक वाटिका में रावण के समक्ष माता सीता का अविचल आत्मसम्मान—वह दृश्य भारतीय मानस में आज भी न्याय और सत्य की ज्वाला को प्रज्वलित करता है। वे न झुकीं, न डरीं—यह नारी की अपराजेय शक्ति का दिव्य उदाहरण है।

तुलसीदास जी का यह कालजयी कथन आज भी सामाजिक विमर्श का आधार है—

“धीरज धरम मित्र अरु नारी।

आपद काल परखिए चारी॥”

यहाँ ‘नारी’ को जीवन के उन चार स्तम्भों में प्रतिष्ठित किया गया है, जिनकी प्रामाणिकता संकट के क्षणों में सिद्ध होती है। माता जानकी इस सत्य की परम परिपूर्णता हैं—वे धैर्य की अवधारणा, प्रेम की पराकाष्ठा और त्याग की परमावधि हैं।

पत्रकारिता की दृष्टि से यदि इस पर्व का विश्लेषण किया जाए, तो ‘सीता नवमी’ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का जागरण है। आज के युग में, जब नारी-सशक्तिकरण की चर्चा वैश्विक मंचों पर हो रही है, तब माता सीता का जीवन हमें यह सिखाता है कि सशक्तिकरण केवल अधिकारों से नहीं, अपितु आत्मबल, स्वाभिमान और नैतिकता से परिपूर्ण होता है।

उनका जीवन यह स्पष्ट करता है कि नारी वस्तु नहीं, विचार है; वह सीमा नहीं, संभावना है; वह मौन नहीं, महाशक्ति है।

संस्कृत का यह शाश्वत वाक्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है—

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।”

अतः, सीता नवमी का यह पावन अवसर हमें केवल उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी संदेश देता है। क्या हम वास्तव में नारी को वह सम्मान दे पा रहे हैं, जिसकी वह अधिकारी है? क्या हम उसके स्वत्व और गरिमा की रक्षा कर पा रहे हैं?

आइए, इस दिव्य पर्व पर हम यह संकल्प लें—

कि हम माता जानकी के आदर्शों को केवल स्मरण नहीं, अपितु आचरण में भी उतारेंगे;

कि हम नारी को सम्मान, सुरक्षा और समान अवसर प्रदान करेंगे;

कि हम एक ऐसे समाज का निर्माण करेंगे, जहाँ हर ‘सीता’ निर्भय, स्वाभिमानी और गौरवान्वित होकर जी सके।

इसी में इस पर्व की सार्थकता है, इसी में हमारी संस्कृति की सफलता।

जय सिया राम। जय वैदेही जननी।

 

✍️ लेखकः-

 

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