द धम्मपद: प्राचीन ज्ञान और आधुनिक जीवन के बीच सेतु

ग्रेटर नोएडा:“द धम्मपद: रिटेलिंग द वर्सेज़ एंड स्टोरीज़ फ्रॉम अ फ्रेश पर्सपेक्टिव” शीर्षक से प्रकाशित नई पुस्तक बौद्ध धर्म के अत्यंत पूज्य ग्रंथ धम्मपद की शिक्षाओं को एक नवीन काव्यात्मक और चिंतनशील रूप में प्रस्तुत करती है। यह कृति गौतम बुद्ध की मूल पालि शिक्षाओं को समकालीन जीवन की नैतिक और मानसिक चुनौतियों के संदर्भ में पुनः व्याख्यायित करती है, जिससे प्राचीन ज्ञान आधुनिक पाठकों के लिए अधिक सुलभ और प्रासंगिक बन जाता है। धम्मपद बौद्ध साहित्य का एक आधारभूत ग्रंथ है, जिसमें 26 अध्यायों में संगठित 423 गाथाएँ सम्मिलित हैं। इन संक्षिप्त किंतु गहन शिक्षाओं में बुद्ध के उपदेशों का सार निहित है, जिनमें सति (स्मृति), नैतिक आचरण, मानसिक अनुशासन और मुक्ति के मार्ग का विवेचन किया गया है। इस नई प्रस्तुति में मूल ग्रंथ की संरचना को बनाए रखते हुए पारंपरिक पालि अध्याय शीर्षकों, जैसे यमकवग्ग, अप्पमादवग्ग और भिक्खुवग्ग—को यथावत रखा गया है, जबकि गाथाओं को प्रवाहमयी ध्यानात्मक कविता के रूप में पुनः प्रस्तुत किया गया है। इस साहित्यिक शैली के माध्यम से धम्मपद की शिक्षाओं को एक नई भावनात्मक गहराई और अभिव्यक्ति प्राप्त होती है। यह काव्यात्मक पुनर्कथन पाठकों को इन शिक्षाओं के दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थों से अधिक गहन रूप से जुड़ने का अवसर देता है। इस प्रकार यह कृति प्राचीन बौद्ध दर्शन और आधुनिक जीवन के अनुभवों के बीच एक सेतु का कार्य करती है

272 पृष्ठों में प्रकाशित इस प्रथम हार्डकवर संस्करण में यह दर्शाया गया है कि धम्मपद की शिक्षाएँ आज के समय में भी कितनी प्रासंगिक हैं। आज की दुनिया, जो तनाव, सामाजिक संघर्ष और नैतिक अनिश्चितताओं से घिरी हुई है, उसमें बुद्ध के उपदेश व्यक्ति को आंतरिक शांति, नैतिक स्पष्टता और संतुलित जीवन का मार्ग प्रदान कर सकते हैं। यह कृति उन शाश्वत सत्यों को रेखांकित करती है कि मन ही अनुभवों को आकार देता है, सदाचार से वास्तविक सुख उत्पन्न होता है और सति (स्मृति) तथा आत्मसंयम से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। यह पुस्तक सत्य, सदाचार, सुख और आंतरिक मुक्ति की सार्वभौमिक मानवीय आकांक्षाओं पर भी प्रकाश डालती है। ध्यानात्मक कविता के माध्यम से प्रस्तुत यह पुनर्कथन पाठकों को केवल बौद्ध शिक्षाओं को समझने ही नहीं, बल्कि उन्हें अपने जीवन में आत्मसात करने के लिए भी प्रेरित करता है।
इस पुस्तक के लेखक अरविंद कुमार सिंह बौद्ध अध्ययन के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शिक्षाविद् हैं। वर्तमान में वे लुंबिनी बौद्ध विश्वविद्यालय, नेपाल में प्रतिष्ठित डॉ. बी. आर. अंबेडकर चेयर फॉर बौद्ध स्टडीज़ के अंतर्गत विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। यह नियुक्ति इंडियन काउंसिल फॉर कल्चरल रिलेशंस (ICCR) के माध्यम से भारत सरकार द्वारा की गई है। लुंबिनी में उनकी नियुक्ति भारत और नेपाल के बीच अकादमिक सहयोग को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जाती है। बोधगया के निवासी प्रो. सिंह ने दिल्ली विश्वविद्यालय से बौद्ध अध्ययन में पीएच.डी. प्राप्त की है, वहीं से उन्होंने बी.ए., एम.ए. और एम.फिल. की डिग्रियाँ भी अर्जित कीं। उन्होंने अपने शिक्षण करियर की शुरुआत 2006 से 2011 तक दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन से की। इसके बाद वे गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा से जुड़े, जहाँ उन्होंने हेड ऑफ स्कूल, डायरेक्टर ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स और पीएच.डी. कार्यक्रम समन्वयक सहित कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक और शैक्षणिक दायित्व निभाए। इसके अतिरिक्त उन्होंने विश्वविद्यालय में जनसंपर्क अधिकारी और अंतरराष्ट्रीय छात्रावास के वार्डन के रूप में भी सेवाएँ दीं।
गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय में अपने कार्यकाल के दौरान प्रो. सिंह ने अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सहयोग को सुदृढ़ करते हुए दक्षिण कोरिया और थाईलैंड सहित विभिन्न देशों के बौद्ध संस्थानों के साथ समझौता ज्ञापनों (MoUs) की पहल की और अनेक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का आयोजन किया, जिससे विश्वविद्यालय की वैश्विक पहचान को नई ऊँचाई मिली। प्रो. सिंह एक विपुल लेखक और शोधकर्ता हैं। उन्होंने 100 से अधिक शोध लेख प्रकाशित किए हैं तथा छह महत्वपूर्ण पुस्तकों का लेखन या संपादन किया है। एक मार्गदर्शक के रूप में उन्होंने 10 पीएच. डी., 26 एम.फिल. और 38 एम.ए. शोध प्रबंधों का निर्देशन किया है, जिनमें से कई छात्रों ने अपने शोध को पुस्तक रूप में प्रकाशित भी किया है।
बौद्ध अध्ययन और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है। उन्हें महात्मा बुद्ध शांति पुरस्कार (2020) और डॉ. एस. राधाकृष्णन बेस्ट फैकल्टी अवॉर्ड (2021) सहित कई सम्मान प्राप्त हुए हैं। उन्होंने यूनाइटेड नेशंस डे ऑफ वेसाक के अंतर्गत आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भी व्याख्यान दिए हैं, जो वियतनाम, थाईलैंड, कंबोडिया, श्रीलंका, रूस और नेपाल जैसे देशों में आयोजित हुए हैं। इसके अतिरिक्त वे न्यूज़ीलैंड, संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत की विभिन्न अकादमिक पत्रिकाओं तथा संस्थानों के सलाहकार और संपादकीय बोर्डों में भी सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं।
द धम्मपद: रिटेलिंग द वर्सेज़ एंड स्टोरीज़ फ्रॉम अ फ्रेश पर्सपेक्टिव केवल एक साहित्यिक पुनर्कथन नहीं, बल्कि धम्मपद की शाश्वत शिक्षाओं को आधुनिक जीवन में आत्मसात करने का एक प्रेरक प्रयास है। यह पुस्तक पाठकों को बुद्ध के उपदेशों को अपने जीवन में उतारने, नैतिक और सजग जीवनशैली अपनाने तथा असंयमित मन की अशांति से निकलकर जागृत चेतना की शांति और प्रज्ञा की ओर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करती है। बौद्ध दर्शन, आध्यात्मिक चिंतन और नैतिक जीवन के मार्गदर्शन की खोज करने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तक एक महत्वपूर्ण और उपयोगी कृति सिद्ध होगी।






