दनकौर

स्वर्गीय श्री वेद प्रकाश अग्रवाल के सामाजिक सरोकारों के सपने को साकार करते हुए ने घरभरा गांव में चलाया सामाजिक जागरूकता अभियान

श्री द्रोण गौशाला समिति के अंतर्गत संचालित श्री द्रोणाचार्य पीजी कॉलेज दनकौर के द्वारा पर्यावरण संरक्षण, दहेज प्रथा, शिक्षा, लैंगिक समानता, नशा उन्मूलन एवं नैतिक मूल्यों पर हुआ सार्थक संवाद

दनकौर:श्री द्रोणाचार्य गौशाला समिति के अंतर्गत संचालित श्री द्रोणाचार्य पी.जी. कॉलेज, दनकौर द्वारा कॉलेज के सचिव श्री रजनीकांत अग्रवाल जी के साकेतवासी पिताजी स्वर्गीय श्री वेद प्रकाश अग्रवाल जी द्वारा महाविद्यालय के लिए देखे गए उस सपने को साकार करने की दिशा में, जिसमें शिक्षा के साथ-साथ समाज के प्रति जागरूकता, सेवा और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को बढ़ावा देना प्रमुख उद्देश्य रहा है, सामाजिक जागरूकता अभियान के अंतर्गत ग्राम घरभरा में एक सफल एवं प्रभावशाली जागरूकता बैठक का आयोजन किया गया।

इस अभियान का उद्देश्य ग्रामीण समाज को पर्यावरण संरक्षण, दहेज प्रथा, शिक्षा, लैंगिक समानता, नशा उन्मूलन, नैतिक मूल्यों तथा स्वस्थ जीवनशैली जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक विषयों के प्रति जागरूक करना रहा। महाविद्यालय द्वारा आयोजित इस पहल में शिक्षकों एवं छात्राओं ने सक्रिय सहभागिता करते हुए ग्रामीण समाज के साथ संवाद स्थापित किया और सामाजिक समस्याओं के समाधान में सामूहिक भागीदारी का आह्वान किया।

कार्यक्रम की मेजबानी ग्राम घरभरा के मास्टर जी श्री सुंदर भाटी द्वारा की गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ नागरिक श्री नेपाल जी ने की, जबकि कार्यक्रम का सफल संचालन विज्ञान संकाय के विभागाध्यक्ष एवं एनएसएस सहायक कार्यक्रम अधिकारी श्री अमित नागर ने किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलन एवं माल्यार्पण के साथ हुआ। इसके पश्चात वक्ताओं ने समाज एवं वर्तमान पीढ़ी से जुड़े विभिन्न गंभीर विषयों पर अपने विचार रखते हुए ग्रामीणों से सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन में सक्रिय भागीदारी का आह्वान किया।

कार्यक्रम के संचालक श्री अमित नागर ने पर्यावरण प्रदूषण विषय पर विस्तृत व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने भूमि प्रदूषण, वायु प्रदूषण तथा आधुनिक जीवनशैली से उत्पन्न पर्यावरणीय चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रकृति के साथ अत्यधिक हस्तक्षेप का प्रतिकूल प्रभाव मानव जीवन के साथ-साथ समस्त जीव-जगत पर पड़ रहा है।

उन्होंने मोबाइल फोन एवं अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के अत्यधिक एवं असावधानीपूर्ण उपयोग से जुड़े संभावित स्वास्थ्य प्रभावों के प्रति भी लोगों को सचेत किया तथा युवाओं को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक हमारे जीवन को सरल बनाने का साधन है, लेकिन उसका विवेकपूर्ण और संतुलित उपयोग आवश्यक है। उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, स्वच्छ पर्यावरण तथा स्वस्थ जीवनशैली को अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि यदि मनुष्य ने अपने निजी स्वार्थ के लिए प्रकृति के साथ अनावश्यक छेड़छाड़ जारी रखी तो आने वाली पीढ़ियों को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

उन्होंने खान-पान में भी संतुलन रखने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि पश्चिमी जीवनशैली का अंधानुकरण करने के बजाय हमें अपनी पारंपरिक भारतीय जीवन-पद्धति, स्थानीय खान-पान और प्राकृतिक परिवेश में निहित स्वास्थ्यकर मूल्यों को समझना चाहिए।

इसके बाद इतिहास विभाग की सहायक आचार्य डॉ. नाज परवीन ने दहेज प्रथा जैसे गंभीर सामाजिक अभिशाप पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि दहेज केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि यह महिलाओं के सम्मान, अधिकार और जीवन से जुड़ा गंभीर सामाजिक प्रश्न है। दहेज की मांग के कारण अनेक परिवार आर्थिक दबाव झेलते हैं तथा अनेक महिलाओं को मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।

उन्होंने ग्रामीण समाज से आह्वान किया कि दहेज प्रथा को समाप्त करने के लिए प्रत्येक परिवार को स्वयं पहल करनी होगी। उन्होंने कहा कि विवाह को आर्थिक लेन-देन का माध्यम बनाने के बजाय इसे समानता, सम्मान और पारिवारिक सहयोग का पवित्र संबंध बनाया जाना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से युवाओं से दहेज-विरोधी संकल्प लेने का आह्वान किया।

तत्पश्चात समाजशास्त्र एवं शिक्षा विभाग के सहायक आचार्य तथा विभागाध्यक्ष डॉ. राजीव पांडे ने शिक्षा के महत्व पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्ति के व्यक्तित्व, विवेक, सामाजिक चेतना और जिम्मेदारी का निर्माण करने वाली शक्ति है।

उन्होंने कहा कि शिक्षित समाज ही अपने अधिकारों और कर्तव्यों को बेहतर ढंग से समझ सकता है। शिक्षा व्यक्ति को अंधविश्वास, सामाजिक कुरीतियों, भेदभाव और नशे जैसी समस्याओं से दूर रहने के लिए विवेक प्रदान करती है। उन्होंने अभिभावकों से आग्रह किया कि वे बच्चों की शिक्षा को केवल परीक्षा और रोजगार तक सीमित न रखें, बल्कि उनमें संवेदनशीलता, अनुशासन, ईमानदारी, सहिष्णुता और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे मानवीय मूल्यों का भी विकास करें।

उन्होंने कहा कि गांवों में शिक्षा का प्रसार जितना अधिक होगा, सामाजिक जागरूकता और विकास की गति भी उतनी ही तेज होगी।

कार्यक्रम का सबसे प्रभावशाली एवं आकर्षक हिस्सा लैंगिक भेदभाव पर आधारित नुक्कड़ नाटक रहा। यह नाटक प्रसिद्ध नाटककार महेश दत्तानी के नाटक तारा से प्रेरित था और इसका निर्देशन डॉ. अजमत आरा के दिशा-निर्देशन में किया गया।

नाटक में जुड़वां बच्चों के माध्यम से समाज में व्याप्त लैंगिक भेदभाव और पुरुष प्रधान मानसिकता को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। कलाकारों ने यह दिखाया कि किस प्रकार सामाजिक सोच और लैंगिक पक्षपात के कारण एक बालिका के अधिकारों और संभावनाओं को पीछे कर दिया जाता है। नाटक में कविता एवं संवादों के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि बेटे और बेटी में किसी भी प्रकार का भेदभाव समाज के विकास में बाधक है।

नाटक ने उपस्थित ग्रामीणों को गहराई से प्रभावित किया। ग्रामवासियों ने कलाकारों के अभिनय एवं विषय की प्रस्तुति की मुक्तकंठ से सराहना की और लैंगिक समानता को सामाजिक जीवन में अपनाने की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की।

नुक्कड़ नाटक में बी.ए. प्रथम वर्ष की माही नागर, शिवानी, प्रेरणा, साइबा, ज्योति पुत्री श्री रामकुमार, मेहविश एवं ज्योति तथा बी.ए. तृतीय सेमेस्टर की नाजिश, नाजिया, पायल भाटी, खुशी नागर एवं रश्मि ने सक्रिय भूमिका निभाई।

इसके बाद अर्थशास्त्र विभाग के सहायक आचार्य डॉ. सूर्य प्रताप राघव ने नशा उन्मूलन विषय पर विचार रखते हुए कहा कि नशा केवल व्यक्ति के स्वास्थ्य को ही नष्ट नहीं करता, बल्कि उसके परिवार, आर्थिक स्थिति और सामाजिक जीवन को भी प्रभावित करता है। विशेष रूप से युवाओं में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति चिंता का विषय है।

उन्होंने कहा कि नशे से मुक्ति के लिए केवल कानून और प्रशासन पर्याप्त नहीं हैं; परिवार, विद्यालय, महाविद्यालय और समाज को मिलकर जागरूकता का वातावरण तैयार करना होगा। उन्होंने युवाओं से खेल, शिक्षा, साहित्य, रचनात्मक गतिविधियों और सकारात्मक सामाजिक कार्यों से जुड़ने का आह्वान किया। उन्होंने अभिभावकों से भी बच्चों के व्यवहार एवं संगति पर संवेदनशीलता के साथ ध्यान देने की अपील की।

महाविद्यालय के एनएसएस कार्यक्रम अधिकारी डॉ. प्रशांत कनौजिया ने वर्तमान समय में बच्चों एवं युवाओं में दिखाई दे रही नैतिक मूल्यों की कमी पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आधुनिक शिक्षा और तकनीकी विकास के साथ-साथ बच्चों में संस्कार, संवेदनशीलता, अनुशासन, बड़ों का सम्मान, छोटे के प्रति स्नेह तथा समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आज बच्चे सूचना के युग में जी रहे हैं, लेकिन केवल सूचना का अधिक होना ज्ञान और विवेक की गारंटी नहीं है। परिवार, विद्यालय और समाज—तीनों की संयुक्त जिम्मेदारी है कि बच्चों को यह सिखाया जाए कि सफलता केवल धन, पद या प्रतिष्ठा प्राप्त करने का नाम नहीं, बल्कि एक अच्छा और जिम्मेदार मनुष्य बनना भी सफलता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

उन्होंने अभिभावकों से बच्चों को पर्याप्त समय देने, उनके साथ संवाद स्थापित करने तथा मोबाइल और डिजिटल माध्यमों के संतुलित उपयोग के लिए प्रेरित करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि मूल्य आधारित शिक्षा ही ऐसे नागरिकों का निर्माण कर सकती है जो अपने परिवार, समाज, राष्ट्र और प्रकृति के प्रति जिम्मेदार हों।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ताओं में महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. गिरिश कुमार वत्स का संबोधन अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने बच्चों के नैतिक मूल्यों, संस्कार, परिवेश, खान-पान, अनुशासन एवं आदर्श जीवन-पद्धति पर विस्तार से प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि आज के बदलते परिवेश में बच्चों का सर्वांगीण विकास केवल पुस्तकीय ज्ञान से संभव नहीं है। उन्हें संस्कार, अनुशासन, संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी की शिक्षा भी दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि परिवार बच्चे की पहली पाठशाला है और माता-पिता उसके प्रथम शिक्षक हैं। इसलिए बच्चों के व्यवहार और व्यक्तित्व निर्माण में परिवार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

डॉ. वत्स ने संतुलित एवं पौष्टिक खान-पान पर भी विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ विचारों का विकास होता है। अभिभावकों को बच्चों के खान-पान, दिनचर्या और संगति पर ध्यान देना चाहिए तथा उन्हें स्थानीय एवं पौष्टिक भोजन की ओर प्रेरित करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि आधुनिकता को अपनाना आवश्यक है, लेकिन आधुनिकता के नाम पर अपनी भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों को भूलना उचित नहीं है। उन्होंने बच्चों को महान भारतीय परंपरा के आदर्शों से जोड़ने तथा उनमें ईमानदारी, परिश्रम, करुणा, अनुशासन, राष्ट्रप्रेम और मानवता जैसे मूल्यों का विकास करने का आह्वान किया।

प्राचार्य ने ग्रामीण समाज से अपील की कि शिक्षा संस्थान और समाज एक-दूसरे के पूरक हैं। जब महाविद्यालय और गांव मिलकर सामाजिक समस्याओं पर काम करेंगे, तभी वास्तविक और स्थायी परिवर्तन संभव होगा।

कार्यक्रम के अध्यक्ष श्री नेपाल जी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में सभी वक्ताओं, महाविद्यालय के शिक्षकों, छात्राओं तथा ग्रामवासियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम ग्रामीण समाज में जागरूकता उत्पन्न करने और नई पीढ़ी को सामाजिक जिम्मेदारियों से जोड़ने में अत्यंत उपयोगी हैं।

उन्होंने महाविद्यालय द्वारा उठाए गए विभिन्न सामाजिक मुद्दों की सराहना करते हुए कहा कि ग्रामवासी इन संदेशों को केवल सुनने तक सीमित नहीं रखेंगे, बल्कि अपने दैनिक जीवन में उन्हें अपनाने का प्रयास करेंगे।

इस अवसर पर ग्राम घरभरा के प्रमुख नागरिकों एवं गणमान्य व्यक्तियों श्री नेपाल जी, श्री चरण नंबरदार, श्री उदयवीर सिंह, श्री चतर सिंह, श्री ओमपाल भाटी, श्री मानिक भाटी, श्री सुंदर भाटी, श्री पवन गोयल, श्री गजब सिंह, श्री राजेश भाटी, श्री सतीश भाटी, श्री ऋषिपाल भाटी, श्री जोगिंदर भाटी, श्री जिले सिंह फौजी, श्री पुष्पेंद्र भाटी, श्री कालू भाटी, श्री सुबीन भाटी, श्री बाबू भाटी, श्री सत्य भाटी, श्रीमती धर्मावती, श्रीमती रामादेवी, श्रीमती कमला देवी, श्रीमती शशि देवी, श्रीमती साधना देवी, श्रीमती संगीता देवी, श्रीमती बबीता देवी, श्रीमती सविता सहित अन्य ग्रामवासियों को महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. गिरिश कुमार वत्स, कला संकाय के विभागाध्यक्ष श्री अमित नागर, वाणिज्य विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. प्रीति रानी सेन, बी.एड. विभाग की सहायक आचार्य श्रीमती हनी शर्मा, अंग्रेजी विभाग के सहायक आचार्य एवं एनएसएस कार्यक्रम अधिकारी डॉ. प्रशांत कनौजिया, अंग्रेजी विभाग की सहायक आचार्य डॉ. अजमत आरा, कला संकाय के विभागाध्यक्ष डॉ. राजीव पांडे (उर्फ पिंटू), डॉ. सूर्य प्रताप राघव, लिपिक श्री करन नागर तथा इतिहास विभाग की सहायक आचार्या डॉ. नाज परवीन द्वारा स्मृति-भेंट एवं पटका देकर सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ। अंत में ग्राम घरभरा के मेजबान मास्टर जी श्री सुंदर भाटी द्वारा महाविद्यालय से आए सभी आचार्यों, छात्राओं एवं ग्रामवासियों के लिए सूक्ष्म जलपान की व्यवस्था की गई।

कार्यक्रम के पश्चात ग्रामवासियों ने महाविद्यालय के शिक्षकों एवं छात्राओं को सामूहिक रूप से विदाई दी और आश्वासन दिया कि पर्यावरण संरक्षण, दहेज प्रथा के विरोध, शिक्षा के प्रसार, लैंगिक समानता, नशा उन्मूलन तथा नैतिक मूल्यों के संरक्षण जैसे विषयों पर महाविद्यालय द्वारा किए गए आह्वान को धरातल पर लागू करने के लिए वे अपनी ओर से हर संभव प्रयास करेंगे।

यह जागरूकता अभियान स्वर्गीय श्री वेद प्रकाश अग्रवाल जी के उस सामाजिक एवं शैक्षिक दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने की सार्थक पहल रहा, जिसमें शिक्षा को केवल कक्षा और पाठ्यक्रम तक सीमित न रखकर समाज के व्यापक हित एवं जनजागरूकता से जोड़ने की भावना निहित थी। महाविद्यालय द्वारा आयोजित यह अभियान ग्रामीण समाज और शिक्षण संस्था के बीच सामाजिक सहभागिता, संवाद एवं सहयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण एवं सार्थक कदम के रूप में सामने आया।

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